मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

कितनी बार उसने पंख फड़फड़ाया होगा




कितनी बार उसने पंख फड़फड़ाया होगा
तब जाकर एक आशियाना बनाया होगा

सोच कर रूह कांपती है उस मंजिल को देखकर
न जाने कितने सपनों से इसे सजाया होगा
हम सब्र की इन्तहां नहीं रखते जनाब
उसने सब्र से ही परचम लहराया होगा

क़त्ल करके हम यूँ ही निकल जाते हैं मालिक
उसके लहू ने कितनों को रुलाया होगा
अपनी आजादी पर हम छिनते रहे उसकी आजादी
न जाने किस मुल्क में उसने घर बसाया होगा

हम करते रहे इन्तजार उसके ओठ खुलने का
लगता है माधव ने उसी समय शंख बजाया होगा
कितनी बार उसने पंख फड़फड़ाया होगा
तब जाकर एक आशियाना बनाया होगा ||
सर्वेश कुमार मिश्र 
2 अप्रेल 2016
समय-दोपहर 3:00 बजे
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय 
किशनगढ़, अजमेर |

2 टिप्‍पणियां:

  1. मिश्रा जी, जो आपकी निरीक्षण शक्ति है, उसका जवाब नहीं है। इस कविता के माध्यम से अन्योक्ति में जो भाव आपने आज के मनुष्य के संदर्भ में उतारे हैं, प्रशस्य हैं। सुंदर रचना हेतु आभार.....💐💐

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    1. धन्यवाद भाई| आपका उत्तर देना ही हमारी कलम की स्याही में व्याप्त हवा है जो उसे सूखने से बचाएगी |

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