०१- जनवरी -२०१६
समय
की शक्ति अद्भुत होती है, हम जो कभी स्वप्न में भी नहीं सोचते वो इतनी आसानी से
पूर्णता को प्राप्त करता है कि हमें आश्चर्य होता है, परन्तु वहीं जब हमारे द्वारा
देखा हुआ स्वप्न पूरे जीवन को हवन कर देने पर भी साकार रूप नहीं ले पाता । ये समय
की बात है कि आज जो मैं लिखने जा रहा हूँ वह दूर-दूर तक कहीं सोचा हुआ नहीं था ।
हम बात करने जा रहे हैं १०वें विश्व हिंदी सम्मेलन, भोपाल में सहभागिता की । जो
हमें आदरणीय शोध-निर्देशक डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह जी से प्राप्त हुई जिसका आभार
मैं जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा । ये आभार मैं इसलिए नहीं दे रहा हूँ कि १०वें विश्व
हिंदी सम्मेलन में भाग लिया बल्कि इसलिए कि वहाँ पर हमें एक अद्भुत आत्मा के दर्शन
व साथ-साथ ६दिन तक उनके सानिध्य में रहा, जिसने जीने और कुछ अलग ढंग से करने की
नसीहत दे डाली ।
राजस्थान
केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अजमेर की तरफ से पाँच विद्यार्थियों तथा दो आचार्यों को
चुना गया जिसमें मैं भी शामिल था । लगा जैसे छुपा हुआ धन हाथ लग गया हो उस पर सोने
पर सुहागा ये हुआ कि अपनी गाँठ से एक रुपया भी नहीं लगना था । हमारे साथ हमारे
विभागाध्यक्ष तथा और भी शोधार्थीगण वहाँ गए थे जो की वो अपना स्वयं का रुपया लगा
कर गए थे । वो सब भी हमारे साथ-साथ सम्मेलन में थे । हमारे अग्रज भाई अखिलेश जी भी
हमारे साथ थे हम उनको बड़े भाई समझते हैं इसलिए हम स्थान-स्थान पर भाई का संबोधन
करते हैं तो आप उसे अखिलेश भाई ही समझें । अजमेर से भाई जी के परम पूज्य गुरुजी भी
साथ हो लिए । वैसे भाई से हमने अनेक बार गुरुजी का गुण गान करते हुए सुना था इसलिए
क्या वास्तव में गुरूजी ऐसे हैं ये उत्कंठा मन में हमेशा बनी थी की एक बार अवश्य
उनका दर्शन करना है और भाई जी के द्वारा की गई प्रशंसा को परखना है क्योंकि ये
हमारी पूर्वाग्रसित सोच होती है कि हमें व्यक्तिगत जिससे लाभ मिलता है वो हमारे
लिए श्रध्येय बन जाता है चाहे हमसे अलग किसी को लाभ मिले या न मिले । एक बात और कि
क्या इनके गुरूजी इतने महान हैं कि हम अपने किसी आदरणीय का बखान या तुलना इनके
गुरूजी से नहीं कर पा रहे हैं, आप चाहें तो इसको ईर्ष्या का नाम दे सकते हैं, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का निबंध ‘ईर्ष्या तू न गई मेरे मन
से’ याद आ गया । यही उत्सुकता लगभग दो वर्षों से मन में बनी हुई थी जिसका समय आज आ
गया था । जैसे नगीने में एक-एक नग जोड़कर जौहरी नगीने को आकर्षित बनाता है ठीक उसी
प्रकार भाई जी की बताई गई एक-एक बात को मैं गुरुजी के अन्दर देखकर जौहरी बनना
चाहता हूँ ।
जीवन बड़ा विलक्षण है पता नहीं ये मेरा आत्मविश्वास है या अहंकार मैं
समझ नहीं पाया पर इतना जरुर जानता हूँ कि हृदय से की गई मन्नत जरुर पूरी होती है
जैसे मैं गुरूजी से मिला और जैसे मुझे जे.आर.एफ. मिला । पढ़ाई करते समय मन में ये
विचार आता था कि अध्ययन के उच्च शिखर को प्राप्त करूँ जिसकी प्राप्ति हमें 27 वर्ष
11 माह और 17 दिन यानी 13 दिन शेष रहते हुए प्राप्त हुई क्योंकि सामान्य के लिए
जे.आर.एफ. प्राप्त करने की उम्र सीमा अधिकतम 28 वर्ष निर्धारित है । इसे आप भाग्य,
किस्मत या मेरा अपना अथक परिश्रम अथवा जो आपकी सोच हो वो मान सकते हैं क्योंकि
तुलसीदास जी ने लिखा है-
‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’।
अभी
रेलगाड़ी अजमेर पहुंची की गुरूजी का वातानुकूलित डिब्बे में प्रवेश हुआ । मैं काफी
दूर था उनसे । आगे जब रेलगाड़ी कुछ दूर चलने के बाद रुकी तो भाई जी ने कहा की
गुरूजी से मिलेंगे । तो मुझे लगा कि आज हृदयलालसा पूर्ण हुई । मैने कहा अब विलम्ब
कैसा ? मैं उनके साथ हो लिया और वातानुकूलित डिब्बे में पहुँचकर जैसे ही मैने
गुरूजी को देखा देखता ही रह गया जैसे अचानक बल्ब जलने से आँखें चौधिया जाती है ठीक
उसी प्रकार से गुरूजी को देखकर हुआ । मैं थोड़ी देर तक उनको निहारता रहा और भाई जी
हमारा परिचय कराते रहे । फिर मुझे लगा की ये सूरत मैंने कहीं देखी है तब एका-एक
आजकल पत्रिका(अक्टूबर 2007) का ध्यान आया जो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की
जन्मशताब्दी विशेषांक के रूप में निकली थी जिस पर ऊपर तथा अन्दर कई चित्र द्विवेदी
जी के थे उसी चित्र से हुबहू मिलती एक तस्वीर हमारे सामने विराजमान थी । मैं अचानक
जागते हुए गुरु जी का चरण स्पर्श किया और उन्होंने हमें हृदय से आशीर्वाद दिया अब
मेरे मन में दूसरा विचार चलने लगा की जब सूरत इतनी मिलती है तो कीर्ति में भी
समानता खोजी जाय फिर हमने तुलना करना शुरु किया आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और
साक्षात देवत्व की प्रतिमूर्ति डॉ. बद्री प्रसाद पंचोली जी की । किस्मत से गेंद
दोनों हाथों के बीच में थी क्योंकि गुरूजी भी हमारे साथ होटल क्राउन में ही ठहरे
थे । पर उनके साथ भाई जी और बिरमदेव जी थे इधर हमारे साथ अशोक कुमार मिल थे । अभी
हम कमरे में पहुंचे ही थे कि हमने अशोक जी से कहा कि मैं गुरूजी के पास जाना चाहता
हूँ और बिरमदेव को यहाँ भेजना चाहता हूँ, यह कहकर हम जैसे चलने को तैयार हुए ठीक
उसी समय कमरे में बिरमदेव जी का प्रवेश हुआ और उन्होंने यह कहा कि हमें वहाँ रहने
में असुविधा हो रही है इसलिए आप वहाँ चले जाइए । बिरमदेव ने तो हमारे मुख की बात
ही छीन ली और हम तुरंत निकल दिए । कमरे में पहुँच कर हमने गुरूजी को फिर प्रणाम कर
आशीर्वाद लिया । फिर हम तीनों दो लोगों के कमरे में तथा दो लोगों के बिस्तर पर
आराम करने लगे हमने या गुरूजी ने कोई अलग से बिस्तर की मांग नहीं की ।
आपको हम
यहाँ बताते चलें कि भोपाल में या कहीं पर गुरूजी को रुकने की कोई तकलीफ नहीं थी
क्योंकि उनके शिष्यों और मित्रों की संख्या कम न थी पर गुरूजी भाई जी के पास
ज्यादा स्वतन्त्र महसूस करते थे इसलिए उनका निर्णय यहीं रुकने को हुआ । एक बार तो प्रो.मोहन
लाल छिपा (कुलपति, श्री अटल बिहारी बाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय) जी ने अपनी कार
से गुरूजी को साथ में लेकर (हम भी साथ में थे) होटल क्राउन तक पहुचाने आये । गुरूजी के एक कथन से हमारे सोने में कमी आ गई
हम रात में 2 से 3बजे के बाद ही सोते थे और सुबह 6 बजे उठ जाते थे । रात दो –तीन
बजे के पहले गुरूजी से बात करना और बस बात करना क्योंकि गुरूजी ने हमें यह बताया
था कि अगर मैं दस मिनट भी सो लेता हूँ तो मेरी नींद पूरी हो जाती है, बस फिर क्या
था हम गुरूजी के साथ जागने लगे और जैसे गोदी का बच्चा माँ का स्तनपान करते समय
ध्यान मग्न होता है और पेट की भूख शांत करते हुए आनंद उठाता है ठीक उसी प्रकार हम
भी 83 वर्षों के अनुभव का रसास्वादन करने लगे । गुरूजी के साथ हमने किसी टीवी के
संवाददाता की भाँति व्यवहार किया और उनके जीवन तथा विविध अनुभवों के बारे में
जानने का प्रयास किया । और उन्होंने द्विवेदी जी की भांति हँसते और मुस्कुराते हुए
हमारे एक-एक प्रश्न का उत्तर अपने संस्मरणों के द्वारा हमें प्रदान करते रहे ।
उनकी सहजता, साधारणता, उनका मुख पर हाथ रखकर खिलखिला कर हँसना, समय-समय पर
विनोदपूर्ण उक्तियों से वार्तालाप को और अधिक रोमांचक बनाना ये सब बातें हमें उनकी
तरफ चुम्बक की भाँति खींचने लगी । जैसे किसान जब खेत की सिचाई करता है तो पानी
अन्दर-अन्दर मिट्टी को गलाते हुए ऊपर आता है और पूरा खेत पानी –पानी हो जाता है
ठीक उसी प्रकार धीरे-धीरे हमारी और गुरूजी की गुप्तगू होने लगी और मैं अन्दर से
भीगता रहा । आपको बताते चलें कि गुरूजी को मंत्रालय की तरफ से बुलावा आया था और एक
दिन पहले ही उनका टिकट भी हुआ था । गुरूजी का कहना था कि बिना बुलाए कहीं नहीं
जाना चाहिए । गुरूजी जब पहली बार विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन स्थल पर पहुँचे तो
उनका ध्यान सर्वप्रथम मुख्य द्वार के ऊपर लिखे विश्व हिंदी सम्मेलन पर टिक गया और
फिर जब उन्होंने उसकी व्याख्या की तो हम उनका मुख देखते रहे । उन्होंने जो कहा वो इस प्रकार है गुरूजी ने
देखा कि ऊपर लिखा था ‘10 वाँ वि श्व हिंदी
स म्मेलन’ अर्थात दशवां विशेष कुत्तों का हिंदी सम्मेलन । अब आप समझ सकते हैं कि
उनकी पारखी दृष्टि से सायद कोई बचा होगा । सबसे विशेष बात यह है कि वो महत्वपूर्ण
बातें हमें अपने पास बुलाकर धीरे से हमारे कान में कहते और ठहाका मार कर हँस देते ।
गुरूजी ने हमें व्यक्ति के विषय में, समाज के विषय में, देश के संबंध में, हिंदी
साहित्य के संबंध में तथा उन महान लेखकों के विषय में जिनसे उनका व्यक्तिगत परिचय
था उन सबका जो हमारे लिए सुनना उचित था वो हमें अवगत करा रहे थे । हम भी उनका अपने
परिवार का अंग समझ कर नहाने-खाने से लेकर पूरी दिनचर्या का ध्यान रखने लगे थे । आप
अंदाजा नहीं लगा सकते कि गुरूजी ने हमारे अन्दर कौन-कौन सी बातें और कितने प्रकार
के रसों का आस्वादन कराया होगा ।
अंतिम समय जब हम लोगों को भोपाल से वापस आना था
तो भाई जी गुरूजी की जिम्मेदारी हमारे ऊपर ही छोड़ गए क्योंकि उनको अजमेर न जाकर
एका-एक दिल्ली जाना पड़ गया था ।भाई जी ने हमसे कहा कि गुरूजी को आप अजमेर स्टेशन
पर उतार दीजिएगा और वहाँ पर गुरूजी को लेने उनके घर से कोई न कोई आ जाएगा, हमने
उनको आश्वस्त किया आप निश्चिन्त रहें । हम सब साथ में स्टेशन पहुँचे और गुरूजी का
टिकट दूसरे डिब्बे में था उस दिन और रेलगाड़ी पकड़ने से पहले ही बारिश शुरु हो गई थी
बहुत परेशानी हुई लगभग सब भीग गए थे और सामान भी अस्त-व्यस्त हो गया था । गुरूजी
को हम सभी ट्रेन के अन्दर बैठा दिए मगर वो अपनी शीट पर ही जा कर बैठे वो हम सब से
अलग हो गए थे इसलिए हमने उनको अपनों के
बीच में लाकर बैठाया और वहाँ गुरूजी की शीट पर दूसरे व्यक्ति को । अब हमारे
मन में एक संशय बार-बार उठता रहा कि अब कुछ समयांतराल के बाद गुरूजी हमसे दूर हो
जाएँगे फिर क्या था हम पूरी रात सुबह 5 बजे तक गुरूजी से बात करते रहे और सब सोते
रहे ।
यहाँ पर हम आपको एक रोचक बात और बताना चाहेंगे कि ट्रेन के वातानुकूलित
डिब्बे में राठौर ‘सर’ और डॉ.जितेन्द्र ‘सर’ भी थे तो हम उनके पास भी आते जाते रहते
थे । उसी समय हमने विश्व हिंदी सम्मेलन का एक थैला देखा तो जिज्ञासा हुई की इनसे
भी परिचय करना चाहिए फिर क्या था हम उनके पास जा पहुँचे और उनसे बात करके उनको अपने
सर जी के पास लेकर आ गए फिर उन्होंने जो अपना परिचय कराया वो इस प्रकार है ।
उन्होंने बताया की वो विश्व हिंदी सम्मेलन में एक कवि के रूप में बुलाए गए थे पर
मध्य-प्रदेश में बम विस्फोट हो जाने से यह कवि सम्मेलन अस्थगित कर देना पड़ा ।
उन्होंने अपना नाम डॉ. रमेश उपाध्याय ‘बाँसुरी’ बताया । और भी उन्होंने अपने विषय
में काफी कुछ बताया । फिर हमने कवि जी से निवेदन किया कि जब आप को वहाँ कविता सुनाने का अवसर नहीं मिला
तो कृपा करके यहीं महफ़िल जमा लेते हैं और हम सब आप की कविता का रसास्वादन लेते हैं
। कवि जी बहुत ही सरल स्वभाव के थे और तुरन्त तैयार हो गए । कवि जी के साथ- साथ
सभी लोग आमने सामने शीट पर थे और हम रेलगाड़ी के फर्श पर विराजमान थे और कवि जी की
सुनाई गई कविता को हम मोबाइल में रिकार्ड कर रहे थे । ये ‘रेलागाड़ी में कवि
सम्मेलन’ लगभग रात 11बजे तक यानि 2 से 3 घंटे चला । फिर सब लोग सोने की तैयारी
करने लगे हम भी वहाँ से गुड नाईट की फार्मेल्टी पूरी करते हुए विदा हुए और गुरूजी
को रात भार सोने नहीं दिया सुबह 5 बजे लगा की गुरूजी सोना चाहते हैं तब हम उनके
पास से हटकर सोने चले गए । सुबह का दैनिक कार्य करते हुए फिर चर्चा परिचर्चा का
दौर जारी हुआ और वो अजमेर तक चला । हम भी गुरूजी से 'सिर में पड़े जुएँ' की भाँति
चिपक गए थे जो उनके अन्दर विद्यमान सारे ज्ञान को पी जाना चाहते थे ।
अजमेर स्टेशन
आ जाने पर हमने गुरूजी को रेलगाड़ी से बाहर उतारा और उनको जिनके साथ जाना था उनका इंतजार
करने लगे । फोन पर फोन कर के पता लगाने लगे की कहाँ पर हैं पर रेलगाड़ी चलने को हो
गई और कोई नहीं आया मैं स्टेशन से बाहर भी जा कर देख आया पर कोई दिखाई नहीं दिया
तब गुरूजी को हमने बताया की सायद कोई आया नहीं आप क्या करेंगे तो उनका जबाब था की
नहीं कोई न कोई आया होगा जरूर इसलिए आप जाइए हम चले जाएँगे । मगर हमारी आत्मा
तैयार नहीं हुई की गुरूजी को अकेला छोड़कर हम चले जाएँ । तत्काल हमने निर्णय लिया
की अब हम गुरूजी को अपने साथ लेकर उनके घर जाएँगे । रेलगाड़ी चलने पर हमने अशोक जी
तथा अन्य लोगों से कहा की आप हमारा सामान याद करके विश्वविद्यालय ले जाइएगा और हम
गुरूजी को उनके घर पहुंचाकर ही आएंगे । रेलगाड़ी चली जाने के बाद हम गुरूजी को साथ
लेकर उनके घर पहुँच गए । गुरूजी जैसे ही घर में प्रवेश किए वैसे ही हमें बैठा कर
रसोई में गए और हमारे लिए अपने हाथ से पानी लेकर आये फिर कहे की आप तो वाराणसी से
हो आपको मीठा भी चाहिए और फिर वही हँसी हँसते हुए रसोई से मीठा भी लेकर आ गए और हम
बस गुरूजी!!!!!कह कर रह गए । उन्होंने कहा कि हमें पता है की बनारस वालों का
आतिथ्य सत्कार कैसे किया जाता है । फिर हम मौन होकर उनके आतिथ्य सत्कार को स्वीकार
करने लगे । हम चाय नहीं पीते ऐसा उन्हें पता था इसलिए घर में जो सबसे बड़ा गिलास था
उसमें दूध लेकर हमारे सामने रख दिया गुरूजी का आदेश गुरूजी के घर में अस्वीकार
कैसे कर सकते हैं बस दबी जुबान में विरोध करते रहे । यहाँ आपको सुनकर आश्चर्य होगा
की घर में हमारा सत्कार करने वालों की कमी नहीं थी पर गुरूजी ने किसी को आदेश नहीं
दिया और खुद रसोई से लाकर हमारे सामने परोसते रहे बस यही बात हमें तकलीफ देती रही
की कहाँ आकर फंस गया मैं कि 83 वर्ष के महान व्यक्ति से मेहमाननवाजी करा रहा हूँ ।
हाथ मसल-मसल के रह जाता था और जैसे कुछ कहता तो तुरंत ही मौन का इशारा मिल जाता और
मैं तिलमिला कर रह जाता । यही काम कोई और करता तो इतनी तकलीफ न होती । जब
मेहमाननवाजी समाप्त हुई तो मैं उनके परिवार से भी मिला जो वहाँ उपस्थित थे और मैं
गुरूजी की बहू जी के साथ किशनगढ़ तक भी आया । अजमेर से किशनगढ़ तक का किराया मैंने नहीं
दिया । आगे चलकर और भी दुख तब हुआ जब हम गुरूजी से विदा लेने के लिए उनका चरण
स्पर्श करने लगे । सर्वप्रथम उन्होंने हमें अपनी पुस्तक ‘जीवन शतपथ’ पर हमारा नाम
लिखकर भेंट दी । यह हमारे लिए किसी राष्ट्रपति पुरस्कार से कम नहीं था यहाँ मेरे
नेत्र सजल हो उठे । मैं कुछ कह न पाया बस यही सोच कर की हिंदी सेवा करने हेतु बढ़ा
मेरा कदम आज प्रथम पुस्तक पाकर धन्य हो गया । आगे जो घटना घटी उसको देखकर मैं
खिसिया सा गया और अन्दर ही अन्दर क्रोधित भी क्योंकि गुरूजी ने अपनी जेब से निकाल
कर हमें 500 रूपए देने लगे तो मैने कहा ये किसलिए तो उनका उत्तर था कि मैं भोपाल
के पहले दिन से ही देख रहा हूँ और आपको सफाई देने की जरुरत नहीं है । तो मैंने बस
इतना कहा कि गुरूजी इसका मतलब हमारा कोई कर्त्तव्य नहीं था आपके प्रति ? गुरूजी आपने
हमारे द्वारा किये गए सभी कार्यों पर पानी फेर दिया इस कारण मैं आप से बहुत नाराज
हूँ । फिर मैने सोचा चलो जाते-जाते गुरूजी को नाराज नहीं करते हैं और हमने उसमें
से 100 रुपया अपने लिए निकाला और बाकी गुरूजी को दे दिया पर गुरूजी ने यह कहते हुए
की जब आप इतने नाराज हैं तो चलो हम आपकी ही करते हैं और उन्होंने 100 रुपया लिया
और 400 रुपया हमें देते हुए ये कहा की बस अब बहुत हो चुका अब विदा लीजिए । हमारे
आँसू पलकों के बीच आकर अटक चुके थे और हम बाहर जा चुके थे ।
कुछ समय बाद भाई जी ने
ही हमें बताया कि गुरूजी जब से भोपाल से घर आये हैं तब से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं
था तो एक दिन घर वालों ने उनको अस्पताल में ले जाकर जाँच करवाई तो वहाँ पता चला की
इनको तो कुछ दिन पहले ही हृदयाघात हो चुका है ये तो ईश्वर का संयोग है की इनको कुछ
हुआ नहीं । हम सुनें तो अवाक! और जब हम दोनों ने गुरूजी के विषय में ध्यान लगाया
तो पता चला कि पहले दिन जब वो रुके थे और बाहर भोजन कर के वापस होटल पहुँचे थे तो
उन्होंने कहा था कि आज जिह्वा का स्वाद कुछ बदला सा है और फिर उनकी आवाज में भी
भारीपन आ गया था पर वहाँ पर वो भी और हम सब भी कोई ध्यान नहीं दिए । प्रभु ने हम
सबका साथ दिया इसके लिए हम सदा गुरूजी के ऋणी रहेंगे हम दोनों बहुत बड़े अपयश से बच
गए । कई दिनों तक नहीं बल्कि आज भी समय-समय पर गुरूजी की वह पवित्र और हंसमुख
तस्वीर मानस पटल पर अंकित होते ही ह्रदय रोमांचित हो उठता है । हमने भाई जी से कई
बार गुरूजी ले मिलवाने के लिए कहा पर संयोग नहीं बन सका अभी तक । गुरूजी के साथ
बिताए गए उन पलों को जब हम स्मरण में लाते हैं और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी
से मन ही मन तुलना करते हैं तो दोनों एक लगते हैं और फिर हमारी मान्यता के अनुसार
पुनर्जन्म सिद्ध हो उठता है ।
गुरूजी के साथ 6 दिन रहने के बाद हमें यह महसूस हुआ
की बड़े भाई अखिलेश जी गुरूजी के जीवन से कुछ कम सीख पाए हैं और हम उनसे आग्रह करते
हैं कि जो समय आगे गुरूजी के सानिध्य में रहने का उनको प्राप्त हो उससे वो अवश्य
सीख लें क्योंकि जब 83 वर्ष की उम्र में भी उनको कहीं किसी से कोई गिला शिकवा नहीं
तो फिर हम सब तो अभी युवा हैं । और अंत में मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि बुजुर्गों
के पास से लिया गया अनुभव और नसीहत किसी आयुर्वेद औषधि से कम नहीं क्योंकि इसके
सेवन से कोई दुष्प्रभाव नहीं होता यानी जिसे अंग्रेजी में कहते हैं ‘नो साइड
इफेक्ट’ ।
धन्यवाद !
सर्वेश
कुमार मिश्र
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
किशनगढ़, अजमेर, राजस्थान ।
चलभाष संख्या – ९५५९६३६७३६,




