ऐसा लगता है कि भारत में हिंदी भाषा व साहित्य की अब कोई आवश्यकता नहीं रह गई है । जिसके बहुत से कारण हैं, जिनमें दो चार का नाम मैं ले लेता हूँ बाकी आप की अंतरात्मा सब जानती है ।
1- केंद्र और राज्य सरकार के जो भी चुनाव होते हैं उसमें लगभग सभी पार्टियों के अपने संकल्प पत्र व घोषणा पत्र होते हैं जिसमें से 'शिक्षा' शब्द ही गायब है, किसी योजना की बात ही छोड़ दीजिए ।
2- कान्वेंट स्कूलों को राज्य व केंद्र सरकार का वरदहस्त मिला हुआ है जिसके तर्ज पर उत्तर-प्रदेश सरकार प्राथमिक विद्यालय को अंग्रेजी माध्यम में तब्दील कर रही है । (इतना तो मैकाले या अंग्रेजों के समय में भी नहीं हुआ ।)
3- वैसे हमारे देश के विद्वतजन (राजनेता) जापान, चीन, रूस आदि तमाम देश को पिछड़ा मानते हैं क्योंकि वहाँ शिक्षा उनकी अपनी भाषा में दी जाती है ।
4- यहाँ की सरकार शिक्षा बजट काट कर व पर्यावरण को जितना बन सके प्रभावित कर पार्क और मूर्ति का निर्माण कर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना चाहती है ।
5- सरकार का यह भी मानना है कि जब बिना शिक्षक के बच्चे 70 से 80 प्रतिशत विषय में ला रहे हैं तो फिर वेतन वृद्धि क्यों की जाय वरन किसी पार्क, मूर्ति या मेले-ठेले पर न खर्च कर दिया जाए ।
6- मजदूर, किसान, बेरोजगार आदि बेबस लोगों के रक्त में रोटी डुबो कर खाने वाले ये सत्तानशीन लोग यह नहीं जानते कि 8 घण्टे स्कूल में रहने के बाद बच्चा 16 घण्टे अपनी मातृभाषा में ही खेलता, खाता व बात करता है ।
7- एक समय था जब अभिभावक (माता-पिता) अनपढ़ होने के कारण बच्चों को नहीं पढ़ा पाते थे ठीक वही स्थिति आज बन रही है जब अभिभावक अंग्रेजी न जानने के कारण अपने बच्चे को पढ़ाने में असमर्थ हैं । कोचिंग संस्थानों के लिए तो 'बागों में बहार है......।
8- सरकार की पूरी मंशा यही है कि बेरोजगारी कैसे बढ़ती रहे, आपसी भाईचारा खत्म होता रहे, सब बदहाल रहे । और यह तभी सम्भव है जब इनकी जड़ 'शिक्षा व्यवस्था' में दीमक लगा कर नष्ट कर दिया जाए ।
9- तमाम भारतीय भाषाओं (संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि) का एक एक कर मृतप्राय हो जाना जब हमने स्वीकार कर लिया तो हिंदी भी अब वेंटिलेटर पर आ गई है । इसको भी स्वीकार कर लेने की आदत डाल लेनी पड़ेगी ।
बाकी आप कुछ जोड़ने घटाने के लिए स्वतंत्र हैं ।
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