🌴 हाँ मैं किसान हूँ 🌴
चित्त की सारी प्रवृत्तियों, कुप्रवृत्तियों का
मैं अकेला विराम हूँ
हाँ मैं किसान हूँ ।
युगों से मेरे दहकते शरीर पर
जो रोटियाँ सेंकने की प्रथा चली है
मैं उनका भी प्राणाधार हूँ
हाँ मैं किसान हूँ ।
महामारियों के दौर में
जब सिंहासन हकलाते हैं
जब सत्ता की बुनियाद हिलने लगती है
तब बनता मैं आधार हूँ
हाँ मैं किसान हूँ ।
शकुनियों के मायाजाल का
मैं एक मात्र पासा हूँ
युगों से बिछते बिछाते
मैं वहीं पड़ा हूँ
तुम मुझे रौंदों, कुचलो, बर्बाद करो
पर मैं इस सृष्टि का वरदान हूँ
हाँ मैं किसान हूँ ।
- सर्वेश
स्वरचित
समय - शाम 7:30 बजे
दिनांक - 19-07-2020
आगरा ।