बुधवार, 31 जनवरी 2018

आओ मरने की जिद करते हैं


जो आया है उसको मरना है
कोई डेंगू से मरता है, कोई मलेरिया से मरता है
कोई सत्ता की हनक से, सत्ता की चौखट पर मरता है
ना जाने कितने लोग दुर्घटनाओं में मर जाते हैं
क्या वे जानते हैं कि आज मुझे मरना है
पर मर जाते हैं ! मर जाते हैं !! मर जाते हैं!!!
ऐसे ही तमाम लोग रोज मर जाते है
पर क्या उनका मरना भी कोई याद कर पाता है

आओ मरने की जिद करते हैं
स्वतंत्रता के पहले देश के लिए लोग मरे, स्वतंत्रता सेनानी कहलाए
आजादी के बाद अधिकांश लोग मरे, तो बड़े प्रेम से भ्रष्टाचारी कहलाए
बड़ी-बड़ी बातें हम करते हैं, आए दिन सीमा पर देश के जवान मरते हैं
अपनी मातृभूमि के लिए वो शहीद होने की जिद किए बैठे हैं, पर हम
बेईमानी, भ्रष्टाचार, नपुंसकता का कोढ़ पैदा करने की जिद किए बैठे हैं

आओ फिर से मरने की जिद करते हैं
कौन जानता है सुबह होगी और मैं जिंदा रहूँगा
तमाम स्वप्न कल सुबह होते ही पूरे हो जाएंगे
क्या पता ! तुम हार्ट अटैक से मर जाओ !!!
तुम प्लेग, भुखमरी, दंगा से मर जाओ !

क्यों ना यूँ मरा जाए जिससे तुम्हारा गाँव-घर याद करे
तुम्हारा देश तुम्हें युग-युग तक याद करे
तुम्हारे लिए कोई  ‘रहमान’ फिर से संगीत तैयार करे

आओ यह माने कि आजादी नहीं मिली हमें
आओ यह माने कि अंग्रेज नहीं गए अभी
आओ यह माने कि सूरज नहीं उगा अभी
आओ यह माने कि आजाद, भगत सिंह गए नहीं कहीं
मैं भ्रष्टाचार, बेईमानी से लड़कर मरुँ
मैं नेताओं की चोचलेबाजी से लड़कर मरुँ
मैं गरीबी, किसान, और अपनी बेटियों के लिए लड़कर मरुँ
मैं अपनी संस्कृति के खिलाफ उठने वाली शक्ति से लड़कर मरुँ  

हाँ पर ध्यान रहे कि मैं मरूँगा कल
आओ इनमें से कोई एक जिद करते हैं
आओ फिर से मरने की कोशिश करते हैं


                                                                                                      लेखक- सर्वेश कुमार मिश्र
निवासी – ग्राम/पोष्ट – ईशापुर
विकास खण्ड- सुइथाकला
जनपद – जौनपुर
दिनांक- 11-11-2017
समय –प्रात: 5 बजे
संपर्क-सूत्र – 9559636736
                                                                                    

घास का सिसकना

अपना विश्वविद्यालय सुन्दरतम है । चारों तरफ फैली हरियाली की चादर हमें सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है, जैसे वो कहती हो कि “आओ आप सभी ध्यान से देखो, मैं आप सबके बीच कितनी प्रसन्नचित्त आनंदविभोर हूँ । जिसमें आपका योगदान सर्वोपरि है, क्योंकि आप हमें छेड़ते नहीं अपितु सहलाते हैं, आप सब हमें प्यार करते हैं अगर आपका प्यार न मिलता तो हमारे ईष्ट सूर्यदेव कब का हमें नष्ट कर देते । आप सब हमारे लिए भगवान हो जो हमारा इतना ख्याल रखते हो । आप सब ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति यदि भले लोगों का संग साथ पा जाए तो रेगिस्तान से भी दो-दो हाथ करने को तैयार हो जाएँ । आप सभी का आभार ।” हरियाली की बातें सुनकर मन आनंदित हो उठा और इस आनंद के क्षण को और अधिक सुरक्षित रखने के लिए मैं दौड़ उठा फुटबाल के मैदान की तरफ । वहाँ टहल ही रहा था कि अचानक से हमें सिसकने की आवाज सुनाई पड़ी मैं सूर्यग्रहण की तरह ठहर सा गया । मैं इधर-उधर देखने लगा पर कहीं कोई दिखाई नहीं दिया पर उस एकांत वातावरण में जैसे सिसकना तीव्र होता गया, मैं विक्षिप्त सा होकर दौड़ने लगा कि अचानक मुझे ठोकर लगी और मैं गिर गया । वहाँ पर बैठने से हमें सिसकना बहुत पास सुनाई दिया मैंने गर्दन घुमाई तो देखा की एक स्थान पर कटी हुई घास का ढेर इकट्ठा किया गया है जब उसके पास गया तो देखा कि उनमें से जिसके अन्दर कुछ प्राण शेष थे वही सब विलाप कर रही थी । मैंने उनसे रोने का कारण पूंछा तो वो बताने को तैयार ही नहीं, मैंने बहुत अनुनय-विनय कि तब जाकर एक लगभग अधमरी सी ‘बुढ़िया घास’ आकर बोली कि ‘चलो बताओ पहले हम थे की आप ?’ ‘यह मेरा क्षेत्र था की आपका ?’  आपका विश्वविद्यालय तो अभी हमारे आगे बच्चा है, अरे हमने तो पता नहीं कितनी पुस्तें खपा दी यहाँ पर इस तरह से मेरे साथ अन्याय नहीं हुआ जो अब हो रहा है । जब आपका यह आलय यहाँ नहीं था तो मैं अपने प्यारे मवेशियों के लिए कितना उपयोगी थी ।               
आपको तो पता ही है कि मेरा यौवन कितने दिनों का होता है यही लगभग बरसात के दो-तीन महीने का । और यही समय मेरे लिए त्याग बलिदान का समय भी होता है । मैं किसी का आहार बन किसी के काम आ जाऊं इससे बड़ा श्रेष्ठतम कार्य और क्या हो सकता है मेरे लिए । अरे मुझे खाने से ही तो तुम्हारे मवेशियों को दूध ज्यादा होता है और सायद आपका पूरा विश्वविद्यालय, आपके मासूम बच्चे आपका या कहें कि पूरा देश उस दूध को किसी न किसी प्रकार से प्रयोग करता ही है, पर देखो आपके प्रशासन ने मेरा क्या हाल बना रखा है । अभी तो कुछ दिनों पहले मुझे लेने हमारे प्रिय मवेशियों के मालिक, मालकिन यहाँ आती थी हम उनसे उनका (मवेशियों) हाल पूंछते और हँसते-हँसते उनका ग्रास बनने की लिए उनके मालिक के हांथों में लोट जाते पर आपके निर्दयी प्रशासन ने तो हमारी सारी ख़ुशी ही छीन ली मेरी हाय लगे उनको । नहीं-नहीं ऐसा नहीं कहते, लोग बुरे हैं तो क्या हुआ हम भी बुरे बन जाएं अरे पगली चन्दन के वृक्ष पर सैकड़ों सर्प लपेटे रहते हैं तो क्या वो अपनी शीतलता त्याग देता है । देखो मैं भी ज्यादा कुछ नहीं कह सकता क्योंकि मैं भी यहाँ शोध करने आया हूँ बड़ा संकट है हमारे ऊपर मैं यहाँ के प्रशासन के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता न सही बोल सकता हूँ और न गलत । हमारे पूर्वजों में मुंशी प्रेमचंद ने कहा है कि “जिसके पैर के नीचे गर्दन दबी हो उसके तलुओं को सहलाना ही अच्छा है ।”  चलो हमारे साहित्यकार बाप, दादा बड़े स्वाभिमानी थे कहीं भी झुक कर नहीं रहे पर तब का समय और था तब हम विदेशियों के गुलाम थे पर आज तो हम अपने ही चाहने वालों के गुलाम हैं अब हम अभिव्यक्ति की आजादी से वंचित हैं । ख़ैर तुम्हारा इस प्रकार से रोना बर्दास्त के बाहर है इसलिए मैं ज्यादा तो नहीं पर पत्र लिख सकता हूँ क्योंकि हमारे लिए भी पेट का सवाल है हमारे भी बाल बच्चे हैं हमारा भी परिवार है । चलो अब हम चलते हैं देर हो रही है जल्दी ही आपकी करुण कथा मैं यहाँ के प्रशासन को दूंगा । और अंत में जब मैं चलने लगा तो बस इतना ही सुन पाया कि चलो किसी ने तो हमारे हित की बात की भगवान उसको शक्ति दे, अभिव्यक्ति दे । मैं सिर झुकाए वहाँ से चल दिया अब मेरा मन उदास था ।
                                                                                                      लेखक-सर्वेश कुमार मिश्र
                                                                                       ग्राम व पोष्ट- ईशापुर,  जिला- जौनपुर उ. प्र.
                                                                                                      संपर्क सूत्र- 9559636736

रामपियारी के घर करुणक्रंदन


हमारे विश्वविद्यालय का पूरा वातावरण प्राकृतिक है । शाम का वातावरण और भवानी जी की थड़ी का तो क्या कहना । भिन्न-भिन्न प्रान्तों से आये बच्चे जब थड़ी पर इकठ्ठे होते हैं तो हमें अपने इलाहाबाद के संगम की याद आ जाती है, ऐसा लगता है मानो संगम के कूलों पर चलने वाली वह पवन तमाम व्यवधानों को पार कर इस परिसर में अपनी शीतल हवा रूपी बहन को पा इतना झूम उठी है कि पूरा वातावरण उनके आनंद रूपी क्षीरसागर में स्नान करने लगा हो । यह सत्य है कि अगर विश्वविद्यालय में कहीं आनंद का क्षण है तो वह है शाम को भवानी जी की थड़ी । और उस थड़ी की मिठास और भी बढ़ जाती है जब भवानी जी ये कहें कि “वो कोई बात नहीं सर आओ पहले चाय तो पियो ।” वैसे मैं 2009 से चाय नहीं पीता ये हमारे करीबी जानते हैं फिर भी भवानी जी का वह सहृदय व्यवहार हमें खींच कर ले जाता है और भवानी जी के द्वारा “वो मिश्रा जी क्या हाल है” और हमारे द्वारा यह कहना कि “और बताइये भवानी जी सब ठीक तो है ।” फिर भवानी जी द्वारा यह कहना “वो हमें क्या हुआ सब तो आपकी दुआ है” हम दोनों गदगद हो जाते हैं ।
मेरी एक बुरी आदत बनती जा रही है मैं किताबों से ज्यादा लोगों को पढ़ने लगा हूँ , गाँवों का भ्रमण करना, वहाँ का जीवन देखना जैसे शगल बनता जा रहा है । प्रकृति को निहारना तो बचपन की आदत है । एक दिन टहलते-टहलते मैं पास के एक गाँव में पहुँच गया । हमारे यहाँ (ईशापुर,जौनपुर, उ.प्र.) के गाँवों से अलग पर ममता, प्यार, सम्मान एक जैसा । हाँ यहाँ का अतिथि सत्कार तो मानो हमारे गाँव को ठेंगा दिखा रहा हो ।
अभी मैं शैतान सिंह के घर बैठा ही था और आपस में बातचीत हो ही रही थी कि अचानक से एक गाँव के बुजुर्ग आये और शैतान के सामने हाथ जोड़कर रोने लगे । शैतान जी ने उनको चुप कराया और चारपाई पर बैठा कर ठंडा पानी पिलाया । पानी पीते समय भी वो हिचकी लेते रहे, आँख से आँसू झरते रहे । शैतान को वो अपने साथ अपने घर ले जाना चाह रहे थे तो मैंने ही पहल कि और हम सब बाबा जी के साथ चल दिए । बाबा जी के घर पहुँचने पर तो वहाँ का दृश्य बड़ा ही कारुणिक था ; सभी तरफ से चीखने-चिलाने की आवाज आ रही थी छोटे-छोटे बच्चे भी रो रहे थे । जब मैंने दरवाजे पर खड़े एक व्यक्ति से पूंछा तो उसने बताया कि “रामपियारी आज सुबह मर गयी जो कि इस परिवार की एक मात्र सहारा थी । बच्चे उसको बहुत प्यार करते थे और वह भी बच्चों को पाकर भावविभोर हो जाया करती थी । उसकी अभी कोई ज्यादा उम्र भी तो नहीं थी, यही दो महीने पहले ही उसने पहले बच्चे को जन्म दिया था । वो देखिए, वहाँ पर वह छोटा सा बच्चा अपनी माँ के लिए कैसे रो रहा है ? उसको घर के अन्य बच्चे कैसे चारों तरफ से घेरकर खड़े हैं ।” यही कहकर वो भी रोने लगे । मैं उनके कन्धे पर हाथ रखा और धीरे से आगे बढ़ गया । दूसरी तरफ चारपाई पर एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठे मिल गए तो मैं उनके पास जाकर उनको प्रणाम किया और पास में ही बैठ गया । उन्होंने सर उठाकर मेरी तरफ आँखें दबाये ऐसे देखा कि एकबार तो मैं डर सा गया । कुछ देर बाद धीरे से उन्होंने पूंछा कि “आप तो हमारे गाँव से नहीं हो, न ही राजस्थान के हो, आप कहाँ से आए हो ।” मैंने बड़े उत्साह से कहा – “बाबा हम तो आपके बगल में जो विश्वविद्यालय है वही से आए हैं ।” इतका सुनना था कि 80 वर्ष की उम्र का वह वृद्ध, अचानक युवा जोश से भर गया और तनकर खड़ा हो गया । अपने बेटे को आवाज लगा कर कहा पकड़ो इसे यही है रामपियारी का कातिल । इसने ही मारा है उसे । पूरे विश्वविद्यालय ने मारा है उसे । यही कह कर वो अचानक चारपाई पर गिर पड़ते हैं और सुन्न पड़ जाते हैं । मैं डर के मारे थर-थर कांपने लगा कि इतने में उनका बड़ा लड़का दीनानाथ आया और मुझे एक तरफ ले गया । मैं जब थोड़ा सा संभल सका तो मैंने दीनानाथ से पूंछा कि आखिर बाबा ने ऐसा क्यों कहा हमें, हमने तो कुछ नहीं कहा, न किया फिर ऐसा क्यों ? दीनानाथ ने हमारे कन्धे पर हाथ रखकर और रुंधे गले से पूरी बात बताई । उसने बताया कि- “रामपियारी के जाने से पूरे परिवार पर मानों पहाड़ टूट पड़ा हो । वो हमारे परिवार का आधार थी, हमारे छोटे-छोटे बच्चों का जीवन थी । अभी दो माह पहले उसने बच्चे को जन्म दिया था । हमारे छोटे बच्चे आस-पास के बच्चों के साथ मिलकर खूब थाली बजाई थी, खूब नाचे थे ; पर देखो आज कैसे सुध-बुध खो कर उस बच्चे से चिपके हुए हैं जो आज अनाथ हो गया है । हमारी रामपियारी को तीन दिन पहले कुछ नहीं हुआ था । वह एकदम स्वस्थ थी पर अचानक दो दिन पहले उसकी तबियत खराब हो गयी और उसने धीरे-धीरे खाना छोड़ दिया । हमने सारे उपाय किये अंत में डॉक्टर को दिखाया तो डॉ साहब ने हमसे पूंछा कि इसे आपने 2-3 महीने से क्या खिलाया है । मैंने सच-सच बता दिया कि कई महीने से विश्वविद्यालय से बचा जूठा भोजन अपनी रामपियारी को खिलाया है । डॉ साहब ने कहा कि आपने रामपियारी को जो खिलाया है उसमें से अगर कुछ बचा हो तो हमें दिखाओ । हमने उन्हें जूठे से भरी हुई बाल्टी उनके पास रख दी । डॉ साहब ने पैर मारकर बाल्टी गिरा दी और पूरा जूठा घर के बाहर फैला दिया फिर पता नहीं क्या आधे घंटे से कभी लकड़ी से तो कभी अपनी अंगुली से कुछ खोजने लगे । अचानक उनको एक छोटा सा टुकड़ा मिल गया और उसे पानी से धोकर दिखाया उस पर सिर्फ ‘स’ लिखा हुआ था ; जिससे यह समझने में डॉ साहब को देर नहीं लगी और उन्होंने तुरंत कहा कि यह सरस दूध के पाउच का टुकड़ा है जिसे आपकी गाय कई महीने से खा रही है वैसे तो किसी जानवर के मुख में जल्दी कोई अखाद्य पदार्थ नहीं जाता फिर भी जब हम उनको जान बूझ कर खिलाएंगे तो वो तो गलती से खा ही लेगी । ऐसे ही टुकड़े ने उसके लीवर, किडनी को ख़त्म कर दिया और उसकी मौत हो गयी । इतना सुनकर वही पास में बैठे सरपंच जी आ गए और सभी को संबोधित कर कहने लगे कि इस गौ हत्या का पाप विश्वविद्यालय के मुखिया को पहले लगेगा क्योंकि उनकी लापरवाही से, उनके लचीले कानून से और विश्वविद्यालय को बारीकी से निरीक्षण न करने का परिणाम है- रामपियारी का मरना । उसके बाद वहाँ के विद्यार्थियों का नम्बर आता है जो अपने आप पर घमण्ड करते हैं कि मैं तो इतने ऊँचे कुल खानदान से हूँ और इतनी बड़ी संस्था में अध्ययन करता हूँ । मैं वैज्ञानिक बनूँगा, डॉक्टर बनूँगा, इंजीनियरिंग की पढ़ाई करूँगा तो इंजीनियर बनूँगा । अरे ! मैं तो कहता हूँ कि इन अबोध बच्चों का आहार छीन कर रामपियारी को मार कर कोई भी कुछ नहीं बन सकता । अगर वह इंसान न बन सका और इन बेचारे निरीह जानवरों के बारे में तनिक सोच भी न सका तो ऐसे विद्यार्थियों को ऐसी संस्था के मालिक को या यह भी कह सकते हैं कि ऐसे संस्थान को अपने देश में रहने का कोई अधिकार नहीं और ये भाई (मेरी तरफ मुख करके) तुम भी इसके दोषी हो क्योंकि तुम भी उसी संस्थान से हो । क्या तुमको पता है कि इस समय रामपियारी की कीमत कितनी थी ? अरे ! पूरे 55 हजार दाम मिल रहा था पर इन निरीह बच्चों के कारण रामपियारी को नहीं बेचा गया । अच्छा मैं आपके आगे हाथ जोड़ता हूँ आपसे हमें कोई सफाई नहीं चाहिए दुखती रगों पर हाथ मत फेरिए आप बस यहाँ से चले जाइए ।
मैं सर नीचे किए हुए और रुधे गले से धीरे-धीरे वहाँ से अपने विश्वविद्यालय चला आया और आज भी मेरे सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा है कि आखिर में रामपियारी की हत्या का दोषी कौन है ?

 
 


लेखक-सर्वेश कुमार मिश्र,
 ग्राम व पोष्ट- ईशापुर,  जिला- जौनपुर उ. प्र.
                                                                                                                         Mob- 9559636736