बुधवार, 31 जनवरी 2018

घास का सिसकना

अपना विश्वविद्यालय सुन्दरतम है । चारों तरफ फैली हरियाली की चादर हमें सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है, जैसे वो कहती हो कि “आओ आप सभी ध्यान से देखो, मैं आप सबके बीच कितनी प्रसन्नचित्त आनंदविभोर हूँ । जिसमें आपका योगदान सर्वोपरि है, क्योंकि आप हमें छेड़ते नहीं अपितु सहलाते हैं, आप सब हमें प्यार करते हैं अगर आपका प्यार न मिलता तो हमारे ईष्ट सूर्यदेव कब का हमें नष्ट कर देते । आप सब हमारे लिए भगवान हो जो हमारा इतना ख्याल रखते हो । आप सब ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति यदि भले लोगों का संग साथ पा जाए तो रेगिस्तान से भी दो-दो हाथ करने को तैयार हो जाएँ । आप सभी का आभार ।” हरियाली की बातें सुनकर मन आनंदित हो उठा और इस आनंद के क्षण को और अधिक सुरक्षित रखने के लिए मैं दौड़ उठा फुटबाल के मैदान की तरफ । वहाँ टहल ही रहा था कि अचानक से हमें सिसकने की आवाज सुनाई पड़ी मैं सूर्यग्रहण की तरह ठहर सा गया । मैं इधर-उधर देखने लगा पर कहीं कोई दिखाई नहीं दिया पर उस एकांत वातावरण में जैसे सिसकना तीव्र होता गया, मैं विक्षिप्त सा होकर दौड़ने लगा कि अचानक मुझे ठोकर लगी और मैं गिर गया । वहाँ पर बैठने से हमें सिसकना बहुत पास सुनाई दिया मैंने गर्दन घुमाई तो देखा की एक स्थान पर कटी हुई घास का ढेर इकट्ठा किया गया है जब उसके पास गया तो देखा कि उनमें से जिसके अन्दर कुछ प्राण शेष थे वही सब विलाप कर रही थी । मैंने उनसे रोने का कारण पूंछा तो वो बताने को तैयार ही नहीं, मैंने बहुत अनुनय-विनय कि तब जाकर एक लगभग अधमरी सी ‘बुढ़िया घास’ आकर बोली कि ‘चलो बताओ पहले हम थे की आप ?’ ‘यह मेरा क्षेत्र था की आपका ?’  आपका विश्वविद्यालय तो अभी हमारे आगे बच्चा है, अरे हमने तो पता नहीं कितनी पुस्तें खपा दी यहाँ पर इस तरह से मेरे साथ अन्याय नहीं हुआ जो अब हो रहा है । जब आपका यह आलय यहाँ नहीं था तो मैं अपने प्यारे मवेशियों के लिए कितना उपयोगी थी ।               
आपको तो पता ही है कि मेरा यौवन कितने दिनों का होता है यही लगभग बरसात के दो-तीन महीने का । और यही समय मेरे लिए त्याग बलिदान का समय भी होता है । मैं किसी का आहार बन किसी के काम आ जाऊं इससे बड़ा श्रेष्ठतम कार्य और क्या हो सकता है मेरे लिए । अरे मुझे खाने से ही तो तुम्हारे मवेशियों को दूध ज्यादा होता है और सायद आपका पूरा विश्वविद्यालय, आपके मासूम बच्चे आपका या कहें कि पूरा देश उस दूध को किसी न किसी प्रकार से प्रयोग करता ही है, पर देखो आपके प्रशासन ने मेरा क्या हाल बना रखा है । अभी तो कुछ दिनों पहले मुझे लेने हमारे प्रिय मवेशियों के मालिक, मालकिन यहाँ आती थी हम उनसे उनका (मवेशियों) हाल पूंछते और हँसते-हँसते उनका ग्रास बनने की लिए उनके मालिक के हांथों में लोट जाते पर आपके निर्दयी प्रशासन ने तो हमारी सारी ख़ुशी ही छीन ली मेरी हाय लगे उनको । नहीं-नहीं ऐसा नहीं कहते, लोग बुरे हैं तो क्या हुआ हम भी बुरे बन जाएं अरे पगली चन्दन के वृक्ष पर सैकड़ों सर्प लपेटे रहते हैं तो क्या वो अपनी शीतलता त्याग देता है । देखो मैं भी ज्यादा कुछ नहीं कह सकता क्योंकि मैं भी यहाँ शोध करने आया हूँ बड़ा संकट है हमारे ऊपर मैं यहाँ के प्रशासन के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता न सही बोल सकता हूँ और न गलत । हमारे पूर्वजों में मुंशी प्रेमचंद ने कहा है कि “जिसके पैर के नीचे गर्दन दबी हो उसके तलुओं को सहलाना ही अच्छा है ।”  चलो हमारे साहित्यकार बाप, दादा बड़े स्वाभिमानी थे कहीं भी झुक कर नहीं रहे पर तब का समय और था तब हम विदेशियों के गुलाम थे पर आज तो हम अपने ही चाहने वालों के गुलाम हैं अब हम अभिव्यक्ति की आजादी से वंचित हैं । ख़ैर तुम्हारा इस प्रकार से रोना बर्दास्त के बाहर है इसलिए मैं ज्यादा तो नहीं पर पत्र लिख सकता हूँ क्योंकि हमारे लिए भी पेट का सवाल है हमारे भी बाल बच्चे हैं हमारा भी परिवार है । चलो अब हम चलते हैं देर हो रही है जल्दी ही आपकी करुण कथा मैं यहाँ के प्रशासन को दूंगा । और अंत में जब मैं चलने लगा तो बस इतना ही सुन पाया कि चलो किसी ने तो हमारे हित की बात की भगवान उसको शक्ति दे, अभिव्यक्ति दे । मैं सिर झुकाए वहाँ से चल दिया अब मेरा मन उदास था ।
                                                                                                      लेखक-सर्वेश कुमार मिश्र
                                                                                       ग्राम व पोष्ट- ईशापुर,  जिला- जौनपुर उ. प्र.
                                                                                                      संपर्क सूत्र- 9559636736

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