साहित्य प्रेमियों को सादर प्रणाम ।
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के 'निर्मला' उपन्यास से कुछ मनके हमने छाँट लिए हैं, अगर इसे आप माला के रूप में उर पर व में धारण करना चाहते हैं तो कई कई बार पढ़ना पड़ेगा उनके पूरे साहित्य को ।
परिवार समाज को देखते हुए साहित्य के माध्यम से भी समझने का प्रयास करना चाहिए जिससे अपने टूटते बिखरते परिवार व समाज को जोड़ सकें व जुड़ सकें ।
---------💐🌻💐🌻🌼🌴🌾🌸🌿-----------
उसके हृदय में एक विचित्र शंका समा गई है, रोम-रोम में एक अज्ञात भय का संचार हो गया है- न जाने क्या होगा? उसके मन में वे उमंगें नहीं हैं, जो युवतियों की आँखों में तिरछी चितवन बनकर प्रकट होती हैं । नहीं, वहाँ अभिलाषाएं नहीं हैं । यौवन का अभी तक पूर्ण प्रकाश नहीं हुआ है ।
----------🌸------------
निशा ने इंदु को परास्त करके अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था । उसकी पैशाचिकी सेना ने प्रकृति पर आतंक जमा रखा था, सदवृत्तियाँ मुँह छिपाए पड़ी थीं और कुवृत्तियाँ विजय गर्व से इठलाती फिरती थीं । वन में वन्य जीव शिकार की खोज में विचरण कर रहे थे और नगरों में नर पिशाच गलियों में मंडराते फिरते थे ।
-----------🌿-----------
उसका अबोध हृदय इस प्यार में वह मातृस्नेह न पाता था, जिससे दैव ने उसे वंचित कर दिया था । यह वात्सल्य न था , केवल दया थी । वह यह वस्तु थी, जिस पर उसका कोई अधिकार न था; जो केवल भिक्षा के रूप में उसे दी जा रही थी । पिता ने पहले भी दो बार मारा था, जब उसकी माँ जीवित थीं; लेकिन तब उसकी माँ उसे छाती से लगाकर रोटी न थी ।
----------🌸--------------
हम लड़कियाँ हैं, हमारा घर नहीं होता ।
-----------🌻-------------
बात कोई न थी, लेकिन दुखी हृदय दुखती हुई आँख है जिसमें हवा से भी पीड़ा होती है ।
-----------💐--------------
मातृस्नेह के सुधा प्रवाह से उसका संतप्त हृदय परिप्लावित हो गया ।
------------🌸-------------
जहाँ आठों पहर के कचहरी-सी लगती थी, वहाँ अब खाक उड़ती है ।
-------------🌼------------
दुधारू गाय की लात किसे बुरी मालूम होती है ?
-------------🌼------------
माल डालने से अच्छी चीज नहीं बन जाती, विद्या चाहिए ।
--------------🌷-----------
विपत्ति आती है तो अकेले नहीं आती ।
------------🌳-------------
वह उसे प्रेम की नहीं सम्मान की वस्तु समझती थी ।
------------🌺-------------
संसार के सब प्राणी सुख-सेज पर ही तो नहीं सोते । मैं भी उन्हीं अभागों में हूँ । मुझे भी विधाता ने दुख की गठरी ढोने के लिए चुना है । वह बोझ सिर से उतर नहीं सकता । उसे फेंकना भी चाहूँ तो नहीं फेक सकती ।
-------------🍀------------
उसकी दृष्टि एक भिखारिन पर लगी हुई थी, जो अपने बालक को गोंद में लिए भिक्षा माँग रही थी । बालक माता की गोद में बैठा हुआ प्रसन्न था, मानो वह किसी राजसिंहासन पर बैठा हो । मंसाराम उस बालक को देखकर रो पड़ा । यह बालक क्या मुझसे अधिक सुखी नहीं है ? इस अनन्त विश्व में ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसे वह गोद के बदले में पाकर प्रसन्न हो ? ईश्वर भी ऐसी वस्तु की सृष्टि नहीं कर सकते ।
------------☘️-------------
लोगों ने कहा - उसके खेल-कूद में बाधा न डालिए । अभी से उसे कैद न कीजिए । खुली हवा में चरित्र के भ्रष्ट होने की उससे कहीं कम संभावना है, जितनी बंद कमरे में । कुसंगत से जरूर बचाइए, मगर यह नहीं कि उसे घर से निकलने ही न दीजिए । युवावस्था में, एकांतवास चरित्र के लिए बहुत ही हानिकारक है ।
----------🏵️-----------
बड़े बड़े महान संकल्प आवेश में जन्म लेते हैं ।
---------🌹------------
जब दूध देती हुई गाय मर गई तो बछिया का क्या भरोसा ? जब फलने फूलने वाला वृक्ष गिर पड़ा तो नन्हे-नन्हे पौधों की क्या आशा ?
---------🌲-----------
जो तुम्हारा जी चाहे दे देना । उन्हें पुस्तकों से बहुत प्रेम है । अच्छी अच्छी पुस्तकें मंगवा देना ।
---------🍁------------
मैं तो सौ बात की एक बात जानती हूँ - नम्रता पत्थर को भी मोम कर देती है ।
----------🏵️------------
तपस्वी लोग तो चन्दन-तिलक नहीं लगाते ? उस जन्म का कोई धूर्त पुजारी होगा ।
------------🍀------------
खुशी में साथ हँसने वाले बहुतेरे मिल जाते हैं, रंज में जो साथ रोए, वही हमारा सच्चा मित्र है । जिन प्रेमियों को साथ रोना नहीं नसीब हुआ, वे मुहब्बत के मजे क्या जानें ?
-----------🌿-------------
सुधा वहाँ से लौटी तो उसके हृदय का बोझ हल्का हो गया था । पति की प्रेमपूर्ण कोमल वाणी ने उसके सारे शोक और संताप का हरण कर लिया था । प्रेम में असीम विश्वास है, असीम धैर्य है, असीम बल है ।
------------🌸--------------
जब हमारे ऊपर कोई बड़ी विपत्ति आ पड़ती है, तो उससे हमें केवल दुख ही नहीं होता- हमें दूसरों के ताने भी सहने पड़ते हैं । जनता को हमारे ऊपर टिप्पणियां करने का वह सुअवसर मिल जाता है, जिसके लिए वह हमेशा बेचैन रहती है ।
-------------🌾-------------
सच कहा है, आदमी हारता है तो अपने लड़कों से ही ।
-----------🌴---------------
मेरी उम्र तुमसे कहीं ज्यादा है जियाराम पर आज तक मैंने अपने पिता जी को किसी बात का जवाब नहीं दिया । वह आज भी मुझे डांटते हैं, सिर झुकाकर सुन लेता हूँ । जानता हूँ, वह जो कुछ कहते हैं, मेरे भले ही को कहते हैं । माता-पिता से बढ़कर हमारा हितैषी और कौन हो सकता है ? उनके ऋण से कौन मुक्त हो सकता है।
------------🌼----------------
सहृदयता का जलाया हुआ दीपक निर्दय व्यंग्य के एक झोंके से बुझ गया । अड़ा हुआ घोड़ा चुमकारने से जोर मारने लगा था, पर हंटर पड़ते ही फिर अड़ गया और गाड़ी पीछे ढकेलने लगा ।
-------------🌻--------------
माँ के हाथ की रोटियाँ लड़कियों को बहुत अच्छी लगती हैं ।
------------💐--------------
खिलाना तो बस माँ ही जानती है ।
-----------🌷---------------
आप लोग सो भी तो जाती हैं मुर्दों से बाजी लगाकर ।
-----------🌳---------------
ईश्वर भी बड़ा अन्यायी है । जो मरे हैं, उन्हीं को मारता है । मालूम होता है दिन आ गए हैं ।
-------------🌺-------------
फूंक-फूंककर चलने में भी अपयश लग ही गया ।
-----------🌲---------------
नन्हें से शिशु का भविष्य विराट रूप धारण करके उसके विचार क्षेत्र पर मंडराता रहता ।
-----------🌹---------------
मातृहीन बालक के समान दुखी दीन प्राणी संसार में दूसरा नहीं होता । और सारे दुख भूल जाते हैं । बालक को माता की याद आई, अम्मा होती तो क्या आज मुझे यह सब सहना पड़ता ? भैया चले गए; जियाराम भी चले गए; मैं ही अकेला यह विपत्ति सहने के लिए क्यों बच रहा ? सियाराम की आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई । उसके शोक-कातर कंठ से एक गहरे निःश्वास के साथ मिले हुए शब्द निकल आए-अम्मा ! तुम भूल क्यों गई, क्यों मुझे नहीं बुला लेती ?
----------🌱--------------
चुपके से हाँडी उठा ली और घी लौटाने चला, इस तरह जैसे कोई कुत्ता किसी नए गाँव में जाता है । उसी कुत्ते की भाँति उसकी मनोगति वेदना उसके एक-एक भाव से प्रकट हो रही थी । उसे देखकर साधारण बुद्धि का मनुष्य भी अनुमान कर सकता था कि वह अनाथ है ।
-----------🏵️--------------
हाँ ! अब उसे रोटियों के भी लाले पड़ गए । दस बजे क्या खाना न बन सकता था ? माना की बाबू जी चले गए थे ।क्या मेरे लिए घर में दो चार पैसे भी न थे ? अम्मा होती, तो इस तरह बिना कुछ खाए-पिए आने देती ? मेरा अब कोई नहीं रह ।
----------☘️---------------
धीरे-धीरे सड़कों पर सन्नाटा छा गया । घरों के द्वार बंद होने लगे । सड़क की पटरियों पर और गलियों में बंसखटे या बोरे-बिछाकर भारत की प्रजा सुख निद्रा में मग्न होने लगी, लेकिन सियाराम घर न लौटा ।
-----------☘️--------------
संसार में सभी बालक दूध की कुल्लियाँ नहीं करते, सभी सोने के कौर नहीं खाते । कितनों को पेट भर भोजन नहीं मिलता, पर घर से विरक्त वही होते हैं, जो मातृ-स्नेह से वंचित हैं ।
-----------🍀---------------
उसके अश्रुपूरित नेत्रों ने उसकी करुण गाथा उससे कहीं विस्तार के साथ सुना दी, जितनी उसकी वाणी कह सकती थी ।
----------🍁----------------
दाने पर मंडराता पक्षी अंत में दाने पर गिर पड़ा । उसके जीवन का अंत पिंजरे में होगा या व्याध की छुरी के तले- यह कौन जानता है ?
-----------💮--------------
जब हृदय जलता है तो वाणी भी अग्निमय हो जाती है ।
-----------🌿--------------
जब एक बात दिल में आ गई, तो उसे हुआ ही समझना चाहिए । अवसर और घात मिले, तो वह अवश्य ही पूरी हो । यह कहकर कोई नहीं निकल सकता कि मैंने तो हँसी की थी । एकांत में ऐसा शब्द जबान पर लाना ही कह देता है कि नियत बुरी थी ।
-----------🌸--------------
लेकिन यह क्या जानती थी कि पुरुषों के मुँह में कुछ और मन में कुछ और होता है । ईश्वर को जो मंजूर था, वह हुआ । ऐसे सौभाग्य मैं वैध्वय को बुरा नहीं समझती । दरिद्र प्राणी उस धनी से कहीं सुखी है, जिसे उसका धन साँप बनकर काटने दौड़े । उपवास कर लेना आसान है, विषैला भोजन करना उससे कहीं मुश्किल !
-----------🌾------------
दीदी जी, अब मुझे किसी वैद्य की दवा फायदा ना करेगी । आप मेरी चिंता ना करें । बच्ची को आपकी गोद में छोड़े जाती हूँ । अगर जीती-जागती रहे तो किसी अच्छे कुल में विवाह कर दीजिएगा । मैं तो इसके लिए अपने जीवन में कुछ ना कर सकी, केवल जन्म देने भर की अपराधीनी हूँ । चाहे क्वांरी रखिएगा, चाहे विष देकर मार डालिएगा, पर कुपात्र के गले ना मढिएगा इतनी ही आपसे विनय है । मैंने आपकी कुछ सेवा न की, इसका बड़ा दुख हो रहा है । मुझ अभागिनी से किसी को सुख नहीं मिला । जिस पर मेरी छाया भी पड़ गई, उसका सर्वनाश हो गया । अगर स्वामी जी कभी घर आएं तो उनसे कहिएगा कि इस करम-जली के अपराध को क्षमा कर दें ।
-------------🌴----------
दीदी जी कहने की बात नहीं पर बिना कहे रहा नहीं जाता । स्वामी जी ने हमेशा मुझे अविश्वास की दृष्टि से देखा, लेकिन मैंने कभी मन में भी उनकी उपेक्षा नहीं की । जो होना था, वह हो चुका था । अधर्म करके अपना परलोक क्यों बिगाड़ती ? पूर्व जन्म में न जाने कौन कौन से पाप किए थे, जिसका यह प्रायश्चित करना पड़ा । इस जन्म में कांटे बोती, तो कौन गति होती !
---------🌼-------------
चौथे दिन संध्या समय वह विपत्ति-कथा समाप्त हो गई । उसी समय जब पशु-पक्षी अपने-अपने बसेरे को लौट रहे थे, निर्मला का प्राण-पक्षी भी दिनभर शिकारियों के निशानों, शिकारी चिडियों के पंजों और वायु के प्रचंड झोंको से आहत और व्यथित अपने बसेरे की ओर उड़ गया ।
पूरा पढ़ने के लिए आप सबका हार्दिक आभार ।
आपने मेरे द्वारा किए गए परिश्रम को सम्मान दिया मैं कृतज्ञ हूँ आप सबका ।
सादर प्रणाम आगे फिर कुछ और...........
-------🙏🙏🙏🙏🌸🌴🌿🙏🙏🙏🙏--------