गुरुवार, 26 मार्च 2020

अपने बचपन के विद्यालय को याद करते हुए........


अपने बचपन के विद्यालय को याद करते हुए........

लगभग 8 से 10 किलोमीटर की दूरी तय कर, बच्चे सरस्वती शिशु मंदिर (अमावाँखुर्द, ईशापुर, जौनपुर, उत्तर-प्रदेश ) में पढ़ने आते थे । मैंने कक्षा 5 तक वहाँ शिक्षा प्राप्त की जो घर से मात्र एक किमी की दूरी पर है । विद्यालय का वातावरण बिल्कुल प्राकृतिक था । खुले आसमान के नीचे भोजन-मंत्र के पश्चात जैसे ही टिफिन खुलता ऊपर से चील और बगल में कुत्ते ताक में रहते । जब भी कोई विद्यार्थी अपना खाली टिफिन देखकर रोने लगता तो बहन जी बगल के छात्र से माँग कर भूख शांत कर देती । हर जाति व धर्म के बच्चे शिशु मंदिर में पढ़ने आते थे । कई मुस्लिम बच्चे हमारे मित्र भी बन चुके थे । कहीं कोई भेदभाव नहीं था ।
लगभग दूसरी या तीसरी कक्षा की बात होगी जब मैं पहली बार स्कूल को बीच में छोड़कर घर आ गया था । बाबा घर पर थे मैं घर के अंदर चला गया । अभी स्कूल का ड्रेस भी उतार नहीं पाया था कि बाबा ने आवाज दी सर्वेश..........?
मैं तो नहीं पर मेरी दादी बाहर निकली तो उन्होंने देखा बाबा तैयार हो, साइकिल निकाल कर उस पर बैठ चुके हैं । दादी को मैं अम्मा कहता था इसलिए अम्मा कहना ज्यादा ठीक समझूँगा । अम्मा के पूंछने पर बाबा समझ कर बोले, चौराहे पर जा रहा था सोचा मिठाई खिला लाऊँ सर्वेश को इसलिए बुला रहा था जल्दी भेजिए । अच्छा अभी भेजती हूँ कहकर अम्मा अंदर से हाथ पकड़कर लाई और साइकिल पर बैठा दिया । थोड़ा-सा घर ओझल होते ही लगातार सिर, पीठ, गाल और पैर पर हाथ बजने लगे और मैं किशोर कुमार की तरह लम्बी तान भरने लगा । सीधे विद्यालय, प्रधानाचार्य जी के कार्यालय के पास साइकिल रोककर मुझे उठाकर उनके कार्यालय में फेंक दिया ऐसे जैसे लोग वृद्धाश्रमों में फेंक देते हैं अपने माता-पिता को ।
प्रधानाचार्य जी सिर झुकाए मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे भूख लगने पर जानवर को देखकर घूरते हों जंगल के राजा । बिना सफाई दिए प्रधानाचार्य जी सुनते रहे और बाबा पता नहीं क्या-क्या सुनाते रहे । हाँ, मैं लगातार बहती नाक व आँसू के मिश्रित स्वाद का पान करते हुए जोर-जोर से सिसक रहा था आधे घंटे बाद बाबा कार्यालय से निकलते हुए व प्रधानाचार्य जी को समझाते हुए और मुझे फिर से दो-चार जड़ते हुए निकले ।
हाँ, तो फिर विद्यालय में बहुत उठापटक हुई और मेरे अंदर तो बस एक ही बात धँस गई जो आजतक नहीं निकल सकी कि स्कूल कभी नहीं छोड़ना है और यह मोह ऐसा लगा कि 35 वर्ष की आयु तक पढ़ता रहा और अभी भी पढ़ रहा हूँ और चाहूँगा कि बाबा को याद करते हुए आजीवन अध्ययनरत रहूँ । जब तक मैं बारहवीं पास नहीं कर लिया तब तक बाबा अनायास ही अचानक से सप्ताह में कभी भी विद्यालय पहुँच जाते थे और सबका हाल-चाल लेकर निकल देते थे अपने अभिन्न मित्र बड़ेबाबू ( बाबा स्व. आनंद किशोर सिंह ) के साथ ठहाका लगाते हुए पट्टीनरेंद्रपुर बाजार की तरफ ।
बच्चों को विद्यालय तक लाने के लिए 3 से 4 वाहन चलते थे कुछ बच्चे साइकिल से स्कूल आते थे लेकिन मैं तो चमकीली गिट्टी बीनते हुए पैदल ही आता अपनी बुआ करुणा के साथ । यह प्रसंग आज भी उनको याद है ।
विद्यालय में मार तो ऐसे पड़ती थी जैसे धोबी कपड़ा धोते हों, वैसे ही आचार्य जी हमको साफ करते थे । शिशु मंदिर में जब तक रहे उस तालाब को कोसते रहे जहाँ बेहया का जंगल उगता था और सोचता कि क्या ईश्वर ने बेहया को वरदान दिया है मासूम बच्चों को थुरने के लिए ।
पढ़ाई ऐसी होती थी कि लगभग आज भी आचार्य जी के नाम जुबान पर हैं । वहाँ से पढ़कर निकले हुए बहुत से छात्र जो अब माँ बाप की भूमिका निभाते कोई इंजीनियर कोई डॉक्टर कोई मास्टर आदि बन बैठे हैं । प्रधानाचार्य जी के साथ आचार्य जी आए दिन गाँव-गाँव का भ्रमण करते और हमारे सामने ही अविभावक से शिकायत सुनते और हिदायत देते हुए घूरकर अगले दिन विद्यालय में खबर लेते । गजब का अनुशासन, गजब की शिक्षा । वह विद्यालय हमारे लिए नालन्दा व तक्षशिला से कम नहीं था पर दुख की बात है कि अब वह भी नालन्दा व तक्षशिला की भाँति हो गया उसके सम्मान व प्रतिष्ठा को उसी प्रकार लूटा गया जैसे नालन्दा को ।
नैतिक शिक्षा, सदाचार, अनुशासन आदि जो हमारे मूल्य हुआ करते थे ( जो अब बहुत कम बचे हुए हैं ) वो पुस्तकों तक सीमित नहीं थे बल्कि विद्यार्थी उसका दैनिक जीवन में कितना पालन करते हैं उसे देखने के लिए सभी आचार्य गाँव-गाँव भ्रमण किया करते थे ।
कक्षा पाँच की बात है मेरी अंग्रेजी की कॉपी खो गई । मैं बहुत परेशान हुआ एक महीने के बाद अचानक से हमारे दूसरे बाबा स्व. अशोक मिश्र विद्यालय आ पहुँचे । उस समय वो संघ में प्रचारक की भूमिका में थे । मैं बहुत खुश हुआ और अपनी कक्षा में सबको बता-बता कर फूला नहीं समा रहा था कि हमारे बाबा आए हैं जिनको घर वाले अंकल कहकर बुलाते हैं । बाबा कॉपियों का ढेर लिए कक्षा में प्रविष्ट हुए तो मैं अंदर से उछल पड़ा । कॉपी पर नाम देखकर एक-एक को बुलाते गए और कॉपी देते गए किसी की एक दो दिन ही पुरानी होती पर जब मेरा नाम पुकारा तो मैं बहुत प्रसन्न होकर उनके पास गया कि मेरी कॉपी मिल गई लेकिन कुछ ही पल में उड़ गई सारी खुशी जब कसके तमाचा गाल पर पड़ा और गुस्से में बोले कि एक महीने से कॉपी गायब है तो पढ़ाई कैसे हो रही होगी पता चल गया । ठकरा गया दिमाग और उतना ही धँस गया जमीन के अंदर । अन्य सहपाठियों की बाँछे तो खिल रही थीं मगर बकरी की तरह ।
कान्वेंट स्कूल जब से पेरेंट्स मीटिंग करने लगे तब से जो हाल आप व्यवस्था की देख रहे हैं ये उनकी मेहनत का उत्कृष्ट परिणाम है । बन गए किताबी कीड़े हमारे बच्चे । एक बार मैं कान्वेंट स्कूल के मैनेजर से मीटिंग के विषय पर बात की तो उनका सीधा जवाब था कि समय कहाँ है घर-घर जाने की और कहीं आपके घर में हमसे योग्य निकल गए तो ?
आज भी अपने सरस्वती शिशु मंदिर के आचार्य व प्रधानाचार्य जी के नाम याद हैं जो छूट रहे हों अपने मित्रों से अनुरोध करता हूँ वो पूरा कर दें ।
मेरी दृष्टि में जो वास्तविक शिक्षक हैं वो कभी मरते नहीं उन्हें अमरत्व का वरदान प्राप्त होता है और वो युगों-युगों तक याद किए जाते रहेंगे ।
श्री सतीश जायसवाल जी प्रधानाचार्य सबके प्रिय और हँसमुख थे जिनकी सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी । उनके देहांत से जो शोक की लहर दौड़ी थी ईशापुर से शाहगंज तक की वह दृश्य आज भी तैर जाता है आँखों के आगे । गज़ब का व्यक्तित्त्व था उनका ऐसा लगता था जैसे वो मौन तपस्वी मधुमक्खियों का छत्ता हों और सब बच्चे उनको हमेशा घेरे रहते ।  श्री रामनाथ आचार्य जी ( स्वर्गवासी ), श्री अमरनाथ आचार्य जी, श्री प्रमोद आचार्य जी, श्री देवी प्रसाद आचार्य जी,  श्री विनय आचार्य जी ( स्वर्गवासी ), श्री राम प्यारे आचार्य जी, श्री शिव कैलाश वैश्य प्रधानाचार्य जी, श्री रामदीन आचार्य जी, श्री सहदेव आचार्य जी ( स्वर्गवासी ), श्री हीरालाल आचार्य जी, श्री ठाकुर प्रसाद प्रधानाचार्य जी, श्री राम आसरे आचार्य जी, श्री हरिहर आचार्य जी आदि । श्री गृजेश काका जी ने बताया कि स्व अरविंद सिंह जो बाद में कंडेक्टर बन गए थे वो भी उसके पहले शिशु मंदिर में कुछ दिन के लिए आचार्य जी के रूप में पढ़ाए थे । हाँ, एक बहन जी थी शशिकला बहन जी ममता, करुणा, दया की साक्षात मूर्ति । और लल्ला, दाई, पन्ना लाल पासवान, दयाराम आदि जो विद्यालय के अभिन्न अंग थे वो कहाँ विस्मृत होने वाले । लल्ला जी रिक्शा चलाते थे और बहुत ही मज़ाकिया थे । चाहे जैसी सफाई हो मैंने कभी दाई को मुँह बिचकाते नहीं देखा । विद्यालय में एक दो कुत्ते भी पाले गए थे वो भी याद है ।
विद्यालय का वार्षिकोत्सव तो पूरे क्षेत्र की शान होता था । बच्चों को सिखाने के लिए श्री जयप्रकाश आचार्य जी, अखिलेश आचार्य जी व श्री गजानन गिडवानी जी दूर सरस्वती शिशु मंदिर से आते थे । जिसमें श्री जयप्रकाश आचार्य जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । छोटे-छोटे बच्चे देश भक्ति की बयार में इतने बह जाते थे कि उनके अंदर से देश भक्ति को निकालने में अभिभावकों को धुनाई भी करनी पड़ती थी । ईशापुर का छोटा-सा सरस्वती शिशु मंदिर पूरे प्रदेश में अपना स्थान रखता था ।  विद्यालय के मंच पर पता नहीं कितने नेता, मंत्री आए पर न संगठन और न ही किसी नेता या प्रबुद्ध नागरिकों ने पीछे मुड़कर उसकी दीन-हीन दशा की तरफ देखा ।
आज वह विद्यालय नालंदा व तक्षशिला की तरह अपने अतीत पर गर्व कर रहा है पर वर्तमान और भविष्य पर खून के आँसू गिरा रहा है । सरस्वती शिशु मंदिर के पतन के बहुत से कारण रहे पर उसी शिशु मंदिर प्रांगण के अंदर जब सुअरबाड़ा खोला गया तो आप समझ सकते हैं कि उस विद्यालय को क्या संबोधित किया गया होगा । आगे का वर्णन करना बस अपने आपको द्रवित करने के लिए ही होगा । श्री गृजेश कुमार सिंह काका जी और श्री अरुण कुमार सिंह ने शिशु मंदिर को याद करते हुए कहा कि “आज के शिशु मंदिर को देखकर गला भर आता है, आँखों में वह स्वर्णिम अतीत झलक उठता है जिसमें पूरे गौरवशाली भारत का दर्शन होता था ।”
कुछ उद्धार हो सके तो कुछ सुझाव अवश्य दें बाकी कोरोना वायरस को देखकर ईश्वर से भी भरोसा उठ रहा है । प्रकृति की देन मानव के अंदर ही डॉक्टर, पुलिस व कुछ समाजसेवी लोगों के रूप में ईश्वर का दर्शन मिल रहा है ।
करबद्ध निवेदन – 

1- अगर आपने पूरा पढ़ा है और इस विद्यालय के विद्यार्थी रहे हैं व किसी पद को सुशोभित कर रहे हैं तो कमेन्ट बॉक्स में लिखेंगे तो अति कृपा होगी । https://www.facebook.com/sarvesh.mishra.35513800

2- कृपया आप सब घर में रहें और सुरक्षित होकर अपने देश को सुरक्षित रखने की कामना करें । 
॥ वन्देमातरम ॥
आपका सर्वेश
26 मार्च 2020
गुरुवार, रात्रि 01:00 बजे
9462012163 / 9559636736

रविवार, 15 मार्च 2020

🌼 बस एक छोटा-सा संकल्प 🌼

🌼 बस एक छोटा-सा संकल्प 🌼

वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से 
वो और थे जो हार गए आसमान से 
- फ़हीम जोगापुरी

मुझे पता है कि मुठ्ठी भर बच्चों से मैं गाँव की तस्वीर नहीं बदल सकता और इन्हीं बच्चों में से आगे चलकर कोई मेरे परिवार या मेरे लिए दुख का कारण बन सकता है, मेरे परिवार का विरोधी बन सकता है पर यह भी विश्वास है कि इसी में से एक बालक डॉक्टर, इंजीनियर, सेना का जवान या जो कुछ वह चाहे बन सकता है ।

मुझे यह भी पता है कि मैं किसी विकलांग या अंधे व्यक्ति की मदद करता हूँ तो वे मेरे लिए कुछ नहीं कर सकते पर प्रकृति सब देखती है और आप जो भी इस धरा पर करते हैं  वह आपको आपकी कल्पना से कई गुना अधिक देती है । जैसे देश व समाज के लिए मरने वालों के लिए उसने अपनी जमीन के कुछ खण्ड को पवित्र बना दिया जिसमें महात्मा गाँधी की समाधि स्थल (राजघाट), भारतरत्न अटल जी की समाधि स्थल 'सदैव अटल'  मक्का, मदीना व अन्य बहुत कुछ है । वह अपने को कटाकर कागज बनाती है और उसमें उनके नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित करती है जो देश के गौरव बन चुके हैं ।

मुझे आप से मतभेद, मनभेद है, हो भी सकता है पर आपके बच्चे से नहीं इसलिए बालमन को तो मिलने दो, उनसे जुड़ने दो, उन्हें तो कुछ सीखने दो ।

इन्हीं सब संकल्पों व कल्पनाओं के साथ सात महीने बाद सात दिन घर पर रहा । अपने घर का काम करते हुए सात दिन बच्चों को बिस्तर से खुद जाकर उन्हें उठाया हूँ और उनके साथ खूब खेलकूद करते हुए जो भी इस अल्पबुद्धि में अच्छा था उनको देने की कोशिश किया हूँ ।

मोदी योगी व अन्य देश का सुधार करें मैं अपने गाँव को किंचित मात्र भी बदल सका तो जीवन सार्थक हो जाएगा ।

लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं 
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है 
- अमीर क़ज़लबाश

💐 आपका सर्वेश 💐
🍁 वन्देमातरम 🍁

16 मार्च 2020
सुबह 5 बजे आगरा से

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

सुख-दुख

किसी को बर्फ की चादर, सितारों भरी मांग लगती है ।
तो किसी को भूख से तड़पते हुए पेट पर 'लात' लगती है ।।
तू संभाल अपने घरों को, ये प्रकृति के देवता हैं ।
सभी के सुख-दुख को, कई हिस्सों में बाँट देते हैं ।।

-सर्वेश

🌷आराम व परिश्रम से मिलने के लाभ / हानि🌷

🌷आराम व परिश्रम से मिलने के लाभ / हानि🌷

जब हम प्रकृति के साथ थे तब सभी प्राणी एक घाट पर पानी पीते थे न कोई बीमारी थी न वैमनस्य की भावना । सिर पर पानी ढोते थे तो नदी व तालाब का पानी निर्मल व पवित्र था । आगे बढ़े तो बाजुओं से पानी खींचने लगे तो कुओं के जल इतने पवित्र हो गए कि उसकी पूजा होने लगी फिर हम दो कदम आगे बढ़े तो 6 नम्बर, पंजाब, और इंडिया मार्का नल से व थोड़ी मेहनत से निकालने लगे तब तक भी गनीमत रही पर पानी की बर्बादी शुरू हुई, जब से हम सिर्फ बटन दबाते हैं तो हजारों लीटर पानी ओवरफ्लो होकर या फिर टूटे व खराब नल से बह जाता है । आप तो घरों में 'आरओ प्लांट' लगा लिए पर उन प्राणियों का क्या ? जिनके लिए आपने सिर्फ जहरीला पानी छोड़ दिया पीने के लिए ।
ठीक इसी प्रकार आप बेरोजगार युवकों व किसानों व नौकरी करने वालों को देखिए । श्रम करने वाला किसी भी धर्म-जाति का हो उसे तो सही से टीवी देखने की फुर्सत नहीं, पड़ोस की मैय्यत में शामिल होने का समय कहाँ ? हिंदी साहित्य के विद्यार्थी, कमलेश्वर की कहानी 'दिल्ली में एक मौत' तो पढ़ी ही होगी तो वो दंगा क्या खाक करेगा ? अरे ! दंगे तो तब होते हैं जब वेतन से अधिक दंगा कराने वाले पेमेंट दें, जब हाथों में काम नहीं होगा, जब देश को देश नहीं, पड़ोसी का खेत समझा जाए (हड़पने के उद्देश्य से), जब फ्री में सब कुछ नेग-न्यौछावर के रूप में मिलता रहेगा तो कहते हैं कि "खाली दिमाग शैतान का घर ।" बस !!!

🙏🙏🌷🏵️आपका सर्वेश 💐🌻🙏🙏

अपना गाँव

🏵️अपना गाँव🏵️

मकान पक्के बन गए तब से गौरैया की चहचहाहट नहीं सुनाई दी । हाँ, व्यक्तियों का आपसी चर्चराना बढ़ता गया । उसकी भी बढ़ने की सीमा थी वह भी अब रूप बदलकर सन्नाटे के रूप में गाँव पर पसर रही है । बहुत पढ़े-लिखे लोग देखे, बहुत लिखने-पढ़ने वालों को भी देख रहे हैं और वो लोग गाँव खाली करके बड़े-बड़े शानदार प्रदूषित शहरों में बस कर गाँव की तस्वीर पर मातम मनाते हैं । ठीक है, आप पेट लेकर गाँव से दूर गए पर सेवानिवृत्त होने या पेट के गदराने पर लौटे क्यों नहीं ? तो उनका उत्तर भी गज़ब का होता है । सुन लो, तो मुँह बिचकाने का मन कर जाए । खैर, 7 महीने बाद अपने गाँव जाना हो रहा है तो ऐसा लग रहा है जैसे पंछी शाम को अपने 'नीड़' पर लौट रहा हो और बच्चों का चहचहाना रुक न रहा हो ।

इन सात महीनों में कितने अपने बिछुड़ गए और कितने पृथ्वी पर आँख खोल चुके होंगे दुनिया या गाँव की भयावह तस्वीर को देखने के लिए ।

मेरा गाँव मेरे अंदर जीवित रहे और गाँव के कण-कण के लिए मेरा जीवन आहुति बने यही कामना ।

🙏हम तो चलते अपने गाँव,
     सबको राम! राम!! राम !!!
     होली की राम! राम!! राम!!!,
     फाल्गुन की राम! राम!! राम!!! 🙏