🏵️अपना गाँव🏵️
मकान पक्के बन गए तब से गौरैया की चहचहाहट नहीं सुनाई दी । हाँ, व्यक्तियों का आपसी चर्चराना बढ़ता गया । उसकी भी बढ़ने की सीमा थी वह भी अब रूप बदलकर सन्नाटे के रूप में गाँव पर पसर रही है । बहुत पढ़े-लिखे लोग देखे, बहुत लिखने-पढ़ने वालों को भी देख रहे हैं और वो लोग गाँव खाली करके बड़े-बड़े शानदार प्रदूषित शहरों में बस कर गाँव की तस्वीर पर मातम मनाते हैं । ठीक है, आप पेट लेकर गाँव से दूर गए पर सेवानिवृत्त होने या पेट के गदराने पर लौटे क्यों नहीं ? तो उनका उत्तर भी गज़ब का होता है । सुन लो, तो मुँह बिचकाने का मन कर जाए । खैर, 7 महीने बाद अपने गाँव जाना हो रहा है तो ऐसा लग रहा है जैसे पंछी शाम को अपने 'नीड़' पर लौट रहा हो और बच्चों का चहचहाना रुक न रहा हो ।
इन सात महीनों में कितने अपने बिछुड़ गए और कितने पृथ्वी पर आँख खोल चुके होंगे दुनिया या गाँव की भयावह तस्वीर को देखने के लिए ।
मेरा गाँव मेरे अंदर जीवित रहे और गाँव के कण-कण के लिए मेरा जीवन आहुति बने यही कामना ।
🙏हम तो चलते अपने गाँव,
सबको राम! राम!! राम !!!
होली की राम! राम!! राम!!!,
फाल्गुन की राम! राम!! राम!!! 🙏
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