🌷आराम व परिश्रम से मिलने के लाभ / हानि🌷
जब हम प्रकृति के साथ थे तब सभी प्राणी एक घाट पर पानी पीते थे न कोई बीमारी थी न वैमनस्य की भावना । सिर पर पानी ढोते थे तो नदी व तालाब का पानी निर्मल व पवित्र था । आगे बढ़े तो बाजुओं से पानी खींचने लगे तो कुओं के जल इतने पवित्र हो गए कि उसकी पूजा होने लगी फिर हम दो कदम आगे बढ़े तो 6 नम्बर, पंजाब, और इंडिया मार्का नल से व थोड़ी मेहनत से निकालने लगे तब तक भी गनीमत रही पर पानी की बर्बादी शुरू हुई, जब से हम सिर्फ बटन दबाते हैं तो हजारों लीटर पानी ओवरफ्लो होकर या फिर टूटे व खराब नल से बह जाता है । आप तो घरों में 'आरओ प्लांट' लगा लिए पर उन प्राणियों का क्या ? जिनके लिए आपने सिर्फ जहरीला पानी छोड़ दिया पीने के लिए ।
ठीक इसी प्रकार आप बेरोजगार युवकों व किसानों व नौकरी करने वालों को देखिए । श्रम करने वाला किसी भी धर्म-जाति का हो उसे तो सही से टीवी देखने की फुर्सत नहीं, पड़ोस की मैय्यत में शामिल होने का समय कहाँ ? हिंदी साहित्य के विद्यार्थी, कमलेश्वर की कहानी 'दिल्ली में एक मौत' तो पढ़ी ही होगी तो वो दंगा क्या खाक करेगा ? अरे ! दंगे तो तब होते हैं जब वेतन से अधिक दंगा कराने वाले पेमेंट दें, जब हाथों में काम नहीं होगा, जब देश को देश नहीं, पड़ोसी का खेत समझा जाए (हड़पने के उद्देश्य से), जब फ्री में सब कुछ नेग-न्यौछावर के रूप में मिलता रहेगा तो कहते हैं कि "खाली दिमाग शैतान का घर ।" बस !!!
🙏🙏🌷🏵️आपका सर्वेश 💐🌻🙏🙏
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें