गुरुवार, 26 मार्च 2020
अपने बचपन के विद्यालय को याद करते हुए........
रविवार, 15 मार्च 2020
🌼 बस एक छोटा-सा संकल्प 🌼
🌼 बस एक छोटा-सा संकल्प 🌼
वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से
वो और थे जो हार गए आसमान से
- फ़हीम जोगापुरी
मुझे पता है कि मुठ्ठी भर बच्चों से मैं गाँव की तस्वीर नहीं बदल सकता और इन्हीं बच्चों में से आगे चलकर कोई मेरे परिवार या मेरे लिए दुख का कारण बन सकता है, मेरे परिवार का विरोधी बन सकता है पर यह भी विश्वास है कि इसी में से एक बालक डॉक्टर, इंजीनियर, सेना का जवान या जो कुछ वह चाहे बन सकता है ।
मुझे यह भी पता है कि मैं किसी विकलांग या अंधे व्यक्ति की मदद करता हूँ तो वे मेरे लिए कुछ नहीं कर सकते पर प्रकृति सब देखती है और आप जो भी इस धरा पर करते हैं वह आपको आपकी कल्पना से कई गुना अधिक देती है । जैसे देश व समाज के लिए मरने वालों के लिए उसने अपनी जमीन के कुछ खण्ड को पवित्र बना दिया जिसमें महात्मा गाँधी की समाधि स्थल (राजघाट), भारतरत्न अटल जी की समाधि स्थल 'सदैव अटल' मक्का, मदीना व अन्य बहुत कुछ है । वह अपने को कटाकर कागज बनाती है और उसमें उनके नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित करती है जो देश के गौरव बन चुके हैं ।
मुझे आप से मतभेद, मनभेद है, हो भी सकता है पर आपके बच्चे से नहीं इसलिए बालमन को तो मिलने दो, उनसे जुड़ने दो, उन्हें तो कुछ सीखने दो ।
इन्हीं सब संकल्पों व कल्पनाओं के साथ सात महीने बाद सात दिन घर पर रहा । अपने घर का काम करते हुए सात दिन बच्चों को बिस्तर से खुद जाकर उन्हें उठाया हूँ और उनके साथ खूब खेलकूद करते हुए जो भी इस अल्पबुद्धि में अच्छा था उनको देने की कोशिश किया हूँ ।
मोदी योगी व अन्य देश का सुधार करें मैं अपने गाँव को किंचित मात्र भी बदल सका तो जीवन सार्थक हो जाएगा ।
लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है
- अमीर क़ज़लबाश
💐 आपका सर्वेश 💐
🍁 वन्देमातरम 🍁
16 मार्च 2020
सुबह 5 बजे आगरा से
शुक्रवार, 6 मार्च 2020
सुख-दुख
किसी को बर्फ की चादर, सितारों भरी मांग लगती है ।
तो किसी को भूख से तड़पते हुए पेट पर 'लात' लगती है ।।
तू संभाल अपने घरों को, ये प्रकृति के देवता हैं ।
सभी के सुख-दुख को, कई हिस्सों में बाँट देते हैं ।।
-सर्वेश
🌷आराम व परिश्रम से मिलने के लाभ / हानि🌷
🌷आराम व परिश्रम से मिलने के लाभ / हानि🌷
जब हम प्रकृति के साथ थे तब सभी प्राणी एक घाट पर पानी पीते थे न कोई बीमारी थी न वैमनस्य की भावना । सिर पर पानी ढोते थे तो नदी व तालाब का पानी निर्मल व पवित्र था । आगे बढ़े तो बाजुओं से पानी खींचने लगे तो कुओं के जल इतने पवित्र हो गए कि उसकी पूजा होने लगी फिर हम दो कदम आगे बढ़े तो 6 नम्बर, पंजाब, और इंडिया मार्का नल से व थोड़ी मेहनत से निकालने लगे तब तक भी गनीमत रही पर पानी की बर्बादी शुरू हुई, जब से हम सिर्फ बटन दबाते हैं तो हजारों लीटर पानी ओवरफ्लो होकर या फिर टूटे व खराब नल से बह जाता है । आप तो घरों में 'आरओ प्लांट' लगा लिए पर उन प्राणियों का क्या ? जिनके लिए आपने सिर्फ जहरीला पानी छोड़ दिया पीने के लिए ।
ठीक इसी प्रकार आप बेरोजगार युवकों व किसानों व नौकरी करने वालों को देखिए । श्रम करने वाला किसी भी धर्म-जाति का हो उसे तो सही से टीवी देखने की फुर्सत नहीं, पड़ोस की मैय्यत में शामिल होने का समय कहाँ ? हिंदी साहित्य के विद्यार्थी, कमलेश्वर की कहानी 'दिल्ली में एक मौत' तो पढ़ी ही होगी तो वो दंगा क्या खाक करेगा ? अरे ! दंगे तो तब होते हैं जब वेतन से अधिक दंगा कराने वाले पेमेंट दें, जब हाथों में काम नहीं होगा, जब देश को देश नहीं, पड़ोसी का खेत समझा जाए (हड़पने के उद्देश्य से), जब फ्री में सब कुछ नेग-न्यौछावर के रूप में मिलता रहेगा तो कहते हैं कि "खाली दिमाग शैतान का घर ।" बस !!!
🙏🙏🌷🏵️आपका सर्वेश 💐🌻🙏🙏
अपना गाँव
🏵️अपना गाँव🏵️
मकान पक्के बन गए तब से गौरैया की चहचहाहट नहीं सुनाई दी । हाँ, व्यक्तियों का आपसी चर्चराना बढ़ता गया । उसकी भी बढ़ने की सीमा थी वह भी अब रूप बदलकर सन्नाटे के रूप में गाँव पर पसर रही है । बहुत पढ़े-लिखे लोग देखे, बहुत लिखने-पढ़ने वालों को भी देख रहे हैं और वो लोग गाँव खाली करके बड़े-बड़े शानदार प्रदूषित शहरों में बस कर गाँव की तस्वीर पर मातम मनाते हैं । ठीक है, आप पेट लेकर गाँव से दूर गए पर सेवानिवृत्त होने या पेट के गदराने पर लौटे क्यों नहीं ? तो उनका उत्तर भी गज़ब का होता है । सुन लो, तो मुँह बिचकाने का मन कर जाए । खैर, 7 महीने बाद अपने गाँव जाना हो रहा है तो ऐसा लग रहा है जैसे पंछी शाम को अपने 'नीड़' पर लौट रहा हो और बच्चों का चहचहाना रुक न रहा हो ।
इन सात महीनों में कितने अपने बिछुड़ गए और कितने पृथ्वी पर आँख खोल चुके होंगे दुनिया या गाँव की भयावह तस्वीर को देखने के लिए ।
मेरा गाँव मेरे अंदर जीवित रहे और गाँव के कण-कण के लिए मेरा जीवन आहुति बने यही कामना ।
🙏हम तो चलते अपने गाँव,
सबको राम! राम!! राम !!!
होली की राम! राम!! राम!!!,
फाल्गुन की राम! राम!! राम!!! 🙏
शुक्रवार, 3 जनवरी 2020
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के निर्मला उपन्यास को पढ़ते हुए
साहित्य प्रेमियों को सादर प्रणाम ।
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के 'निर्मला' उपन्यास से कुछ मनके हमने छाँट लिए हैं, अगर इसे आप माला के रूप में उर पर व में धारण करना चाहते हैं तो कई कई बार पढ़ना पड़ेगा उनके पूरे साहित्य को ।
परिवार समाज को देखते हुए साहित्य के माध्यम से भी समझने का प्रयास करना चाहिए जिससे अपने टूटते बिखरते परिवार व समाज को जोड़ सकें व जुड़ सकें ।
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उसके हृदय में एक विचित्र शंका समा गई है, रोम-रोम में एक अज्ञात भय का संचार हो गया है- न जाने क्या होगा? उसके मन में वे उमंगें नहीं हैं, जो युवतियों की आँखों में तिरछी चितवन बनकर प्रकट होती हैं । नहीं, वहाँ अभिलाषाएं नहीं हैं । यौवन का अभी तक पूर्ण प्रकाश नहीं हुआ है ।
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निशा ने इंदु को परास्त करके अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था । उसकी पैशाचिकी सेना ने प्रकृति पर आतंक जमा रखा था, सदवृत्तियाँ मुँह छिपाए पड़ी थीं और कुवृत्तियाँ विजय गर्व से इठलाती फिरती थीं । वन में वन्य जीव शिकार की खोज में विचरण कर रहे थे और नगरों में नर पिशाच गलियों में मंडराते फिरते थे ।
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उसका अबोध हृदय इस प्यार में वह मातृस्नेह न पाता था, जिससे दैव ने उसे वंचित कर दिया था । यह वात्सल्य न था , केवल दया थी । वह यह वस्तु थी, जिस पर उसका कोई अधिकार न था; जो केवल भिक्षा के रूप में उसे दी जा रही थी । पिता ने पहले भी दो बार मारा था, जब उसकी माँ जीवित थीं; लेकिन तब उसकी माँ उसे छाती से लगाकर रोटी न थी ।
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हम लड़कियाँ हैं, हमारा घर नहीं होता ।
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बात कोई न थी, लेकिन दुखी हृदय दुखती हुई आँख है जिसमें हवा से भी पीड़ा होती है ।
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मातृस्नेह के सुधा प्रवाह से उसका संतप्त हृदय परिप्लावित हो गया ।
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जहाँ आठों पहर के कचहरी-सी लगती थी, वहाँ अब खाक उड़ती है ।
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दुधारू गाय की लात किसे बुरी मालूम होती है ?
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माल डालने से अच्छी चीज नहीं बन जाती, विद्या चाहिए ।
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विपत्ति आती है तो अकेले नहीं आती ।
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वह उसे प्रेम की नहीं सम्मान की वस्तु समझती थी ।
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संसार के सब प्राणी सुख-सेज पर ही तो नहीं सोते । मैं भी उन्हीं अभागों में हूँ । मुझे भी विधाता ने दुख की गठरी ढोने के लिए चुना है । वह बोझ सिर से उतर नहीं सकता । उसे फेंकना भी चाहूँ तो नहीं फेक सकती ।
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उसकी दृष्टि एक भिखारिन पर लगी हुई थी, जो अपने बालक को गोंद में लिए भिक्षा माँग रही थी । बालक माता की गोद में बैठा हुआ प्रसन्न था, मानो वह किसी राजसिंहासन पर बैठा हो । मंसाराम उस बालक को देखकर रो पड़ा । यह बालक क्या मुझसे अधिक सुखी नहीं है ? इस अनन्त विश्व में ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसे वह गोद के बदले में पाकर प्रसन्न हो ? ईश्वर भी ऐसी वस्तु की सृष्टि नहीं कर सकते ।
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लोगों ने कहा - उसके खेल-कूद में बाधा न डालिए । अभी से उसे कैद न कीजिए । खुली हवा में चरित्र के भ्रष्ट होने की उससे कहीं कम संभावना है, जितनी बंद कमरे में । कुसंगत से जरूर बचाइए, मगर यह नहीं कि उसे घर से निकलने ही न दीजिए । युवावस्था में, एकांतवास चरित्र के लिए बहुत ही हानिकारक है ।
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बड़े बड़े महान संकल्प आवेश में जन्म लेते हैं ।
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जब दूध देती हुई गाय मर गई तो बछिया का क्या भरोसा ? जब फलने फूलने वाला वृक्ष गिर पड़ा तो नन्हे-नन्हे पौधों की क्या आशा ?
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जो तुम्हारा जी चाहे दे देना । उन्हें पुस्तकों से बहुत प्रेम है । अच्छी अच्छी पुस्तकें मंगवा देना ।
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मैं तो सौ बात की एक बात जानती हूँ - नम्रता पत्थर को भी मोम कर देती है ।
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तपस्वी लोग तो चन्दन-तिलक नहीं लगाते ? उस जन्म का कोई धूर्त पुजारी होगा ।
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खुशी में साथ हँसने वाले बहुतेरे मिल जाते हैं, रंज में जो साथ रोए, वही हमारा सच्चा मित्र है । जिन प्रेमियों को साथ रोना नहीं नसीब हुआ, वे मुहब्बत के मजे क्या जानें ?
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सुधा वहाँ से लौटी तो उसके हृदय का बोझ हल्का हो गया था । पति की प्रेमपूर्ण कोमल वाणी ने उसके सारे शोक और संताप का हरण कर लिया था । प्रेम में असीम विश्वास है, असीम धैर्य है, असीम बल है ।
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जब हमारे ऊपर कोई बड़ी विपत्ति आ पड़ती है, तो उससे हमें केवल दुख ही नहीं होता- हमें दूसरों के ताने भी सहने पड़ते हैं । जनता को हमारे ऊपर टिप्पणियां करने का वह सुअवसर मिल जाता है, जिसके लिए वह हमेशा बेचैन रहती है ।
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सच कहा है, आदमी हारता है तो अपने लड़कों से ही ।
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मेरी उम्र तुमसे कहीं ज्यादा है जियाराम पर आज तक मैंने अपने पिता जी को किसी बात का जवाब नहीं दिया । वह आज भी मुझे डांटते हैं, सिर झुकाकर सुन लेता हूँ । जानता हूँ, वह जो कुछ कहते हैं, मेरे भले ही को कहते हैं । माता-पिता से बढ़कर हमारा हितैषी और कौन हो सकता है ? उनके ऋण से कौन मुक्त हो सकता है।
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सहृदयता का जलाया हुआ दीपक निर्दय व्यंग्य के एक झोंके से बुझ गया । अड़ा हुआ घोड़ा चुमकारने से जोर मारने लगा था, पर हंटर पड़ते ही फिर अड़ गया और गाड़ी पीछे ढकेलने लगा ।
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माँ के हाथ की रोटियाँ लड़कियों को बहुत अच्छी लगती हैं ।
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खिलाना तो बस माँ ही जानती है ।
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आप लोग सो भी तो जाती हैं मुर्दों से बाजी लगाकर ।
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ईश्वर भी बड़ा अन्यायी है । जो मरे हैं, उन्हीं को मारता है । मालूम होता है दिन आ गए हैं ।
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फूंक-फूंककर चलने में भी अपयश लग ही गया ।
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नन्हें से शिशु का भविष्य विराट रूप धारण करके उसके विचार क्षेत्र पर मंडराता रहता ।
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मातृहीन बालक के समान दुखी दीन प्राणी संसार में दूसरा नहीं होता । और सारे दुख भूल जाते हैं । बालक को माता की याद आई, अम्मा होती तो क्या आज मुझे यह सब सहना पड़ता ? भैया चले गए; जियाराम भी चले गए; मैं ही अकेला यह विपत्ति सहने के लिए क्यों बच रहा ? सियाराम की आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई । उसके शोक-कातर कंठ से एक गहरे निःश्वास के साथ मिले हुए शब्द निकल आए-अम्मा ! तुम भूल क्यों गई, क्यों मुझे नहीं बुला लेती ?
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चुपके से हाँडी उठा ली और घी लौटाने चला, इस तरह जैसे कोई कुत्ता किसी नए गाँव में जाता है । उसी कुत्ते की भाँति उसकी मनोगति वेदना उसके एक-एक भाव से प्रकट हो रही थी । उसे देखकर साधारण बुद्धि का मनुष्य भी अनुमान कर सकता था कि वह अनाथ है ।
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हाँ ! अब उसे रोटियों के भी लाले पड़ गए । दस बजे क्या खाना न बन सकता था ? माना की बाबू जी चले गए थे ।क्या मेरे लिए घर में दो चार पैसे भी न थे ? अम्मा होती, तो इस तरह बिना कुछ खाए-पिए आने देती ? मेरा अब कोई नहीं रह ।
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धीरे-धीरे सड़कों पर सन्नाटा छा गया । घरों के द्वार बंद होने लगे । सड़क की पटरियों पर और गलियों में बंसखटे या बोरे-बिछाकर भारत की प्रजा सुख निद्रा में मग्न होने लगी, लेकिन सियाराम घर न लौटा ।
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संसार में सभी बालक दूध की कुल्लियाँ नहीं करते, सभी सोने के कौर नहीं खाते । कितनों को पेट भर भोजन नहीं मिलता, पर घर से विरक्त वही होते हैं, जो मातृ-स्नेह से वंचित हैं ।
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उसके अश्रुपूरित नेत्रों ने उसकी करुण गाथा उससे कहीं विस्तार के साथ सुना दी, जितनी उसकी वाणी कह सकती थी ।
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दाने पर मंडराता पक्षी अंत में दाने पर गिर पड़ा । उसके जीवन का अंत पिंजरे में होगा या व्याध की छुरी के तले- यह कौन जानता है ?
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जब हृदय जलता है तो वाणी भी अग्निमय हो जाती है ।
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जब एक बात दिल में आ गई, तो उसे हुआ ही समझना चाहिए । अवसर और घात मिले, तो वह अवश्य ही पूरी हो । यह कहकर कोई नहीं निकल सकता कि मैंने तो हँसी की थी । एकांत में ऐसा शब्द जबान पर लाना ही कह देता है कि नियत बुरी थी ।
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लेकिन यह क्या जानती थी कि पुरुषों के मुँह में कुछ और मन में कुछ और होता है । ईश्वर को जो मंजूर था, वह हुआ । ऐसे सौभाग्य मैं वैध्वय को बुरा नहीं समझती । दरिद्र प्राणी उस धनी से कहीं सुखी है, जिसे उसका धन साँप बनकर काटने दौड़े । उपवास कर लेना आसान है, विषैला भोजन करना उससे कहीं मुश्किल !
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दीदी जी, अब मुझे किसी वैद्य की दवा फायदा ना करेगी । आप मेरी चिंता ना करें । बच्ची को आपकी गोद में छोड़े जाती हूँ । अगर जीती-जागती रहे तो किसी अच्छे कुल में विवाह कर दीजिएगा । मैं तो इसके लिए अपने जीवन में कुछ ना कर सकी, केवल जन्म देने भर की अपराधीनी हूँ । चाहे क्वांरी रखिएगा, चाहे विष देकर मार डालिएगा, पर कुपात्र के गले ना मढिएगा इतनी ही आपसे विनय है । मैंने आपकी कुछ सेवा न की, इसका बड़ा दुख हो रहा है । मुझ अभागिनी से किसी को सुख नहीं मिला । जिस पर मेरी छाया भी पड़ गई, उसका सर्वनाश हो गया । अगर स्वामी जी कभी घर आएं तो उनसे कहिएगा कि इस करम-जली के अपराध को क्षमा कर दें ।
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दीदी जी कहने की बात नहीं पर बिना कहे रहा नहीं जाता । स्वामी जी ने हमेशा मुझे अविश्वास की दृष्टि से देखा, लेकिन मैंने कभी मन में भी उनकी उपेक्षा नहीं की । जो होना था, वह हो चुका था । अधर्म करके अपना परलोक क्यों बिगाड़ती ? पूर्व जन्म में न जाने कौन कौन से पाप किए थे, जिसका यह प्रायश्चित करना पड़ा । इस जन्म में कांटे बोती, तो कौन गति होती !
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चौथे दिन संध्या समय वह विपत्ति-कथा समाप्त हो गई । उसी समय जब पशु-पक्षी अपने-अपने बसेरे को लौट रहे थे, निर्मला का प्राण-पक्षी भी दिनभर शिकारियों के निशानों, शिकारी चिडियों के पंजों और वायु के प्रचंड झोंको से आहत और व्यथित अपने बसेरे की ओर उड़ गया ।
पूरा पढ़ने के लिए आप सबका हार्दिक आभार ।
आपने मेरे द्वारा किए गए परिश्रम को सम्मान दिया मैं कृतज्ञ हूँ आप सबका ।
सादर प्रणाम आगे फिर कुछ और...........
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