मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

सबने कहा

सबने कहा-
किताब पढ़ ,
गीता पढ़,
रामायण पढ़, 
देश के क्रांतिकारी शहीदों, दार्शनिकों के विचार पढ़,
इतिहास पढ़ ,
भूगोल पढ़,
पोथी और पुराण पढ़ ।
सब कुछ पढ़कर जब चलना चाहा
तो पीछे से आवाज आई,
निरा पागल है तू !
यह सब दिखावे के लिए पढ़ना है
अमल में लाने के लिए थोड़े ।
तुझे तो जमाने से चार हाथ आगे बढ़कर चलना है ।
चलना ही नहीं ?
घसीटना है,
रगड़ना है,
चिथड़े चिथड़े करना है
उन सब को, जो बचपन में
परिवार,
समाज,
विद्यालय ने तुझे संस्कार के रूप में सिखाया है ।

- सर्वेश कुमार मिश्र
स्व रचित । समय - 17 अक्टूबर 2018, 10:11 am
जयपुर, राजस्थान ।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की प्रतिमूर्ति



०१- जनवरी -२०१६
समय की शक्ति अद्भुत होती है, हम जो कभी स्वप्न में भी नहीं सोचते वो इतनी आसानी से पूर्णता को प्राप्त करता है कि हमें आश्चर्य होता है, परन्तु वहीं जब हमारे द्वारा देखा हुआ स्वप्न पूरे जीवन को हवन कर देने पर भी साकार रूप नहीं ले पाता । ये समय की बात है कि आज जो मैं लिखने जा रहा हूँ वह दूर-दूर तक कहीं सोचा हुआ नहीं था । हम बात करने जा रहे हैं १०वें विश्व हिंदी सम्मेलन, भोपाल में सहभागिता की । जो हमें आदरणीय शोध-निर्देशक डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह जी से प्राप्त हुई जिसका आभार मैं जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा । ये आभार मैं इसलिए नहीं दे रहा हूँ कि १०वें विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लिया बल्कि इसलिए कि वहाँ पर हमें एक अद्भुत आत्मा के दर्शन व साथ-साथ ६दिन तक उनके सानिध्य में रहा, जिसने जीने और कुछ अलग ढंग से करने की नसीहत दे डाली ।

राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अजमेर की तरफ से पाँच विद्यार्थियों तथा दो आचार्यों को चुना गया जिसमें मैं भी शामिल था । लगा जैसे छुपा हुआ धन हाथ लग गया हो उस पर सोने पर सुहागा ये हुआ कि अपनी गाँठ से एक रुपया भी नहीं लगना था । हमारे साथ हमारे विभागाध्यक्ष तथा और भी शोधार्थीगण वहाँ गए थे जो की वो अपना स्वयं का रुपया लगा कर गए थे । वो सब भी हमारे साथ-साथ सम्मेलन में थे । हमारे अग्रज भाई अखिलेश जी भी हमारे साथ थे हम उनको बड़े भाई समझते हैं इसलिए हम स्थान-स्थान पर भाई का संबोधन करते हैं तो आप उसे अखिलेश भाई ही समझें । अजमेर से भाई जी के परम पूज्य गुरुजी भी साथ हो लिए । वैसे भाई से हमने अनेक बार गुरुजी का गुण गान करते हुए सुना था इसलिए क्या वास्तव में गुरूजी ऐसे हैं ये उत्कंठा मन में हमेशा बनी थी की एक बार अवश्य उनका दर्शन करना है और भाई जी के द्वारा की गई प्रशंसा को परखना है क्योंकि ये हमारी पूर्वाग्रसित सोच होती है कि हमें व्यक्तिगत जिससे लाभ मिलता है वो हमारे लिए श्रध्येय बन जाता है चाहे हमसे अलग किसी को लाभ मिले या न मिले । एक बात और कि क्या इनके गुरूजी इतने महान हैं कि हम अपने किसी आदरणीय का बखान या तुलना इनके गुरूजी से नहीं कर पा रहे हैं, आप चाहें तो इसको ईर्ष्या का नाम दे सकते हैं, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का निबंध ‘ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से’ याद आ गया । यही उत्सुकता लगभग दो वर्षों से मन में बनी हुई थी जिसका समय आज आ गया था । जैसे नगीने में एक-एक नग जोड़कर जौहरी नगीने को आकर्षित बनाता है ठीक उसी प्रकार भाई जी की बताई गई एक-एक बात को मैं गुरुजी के अन्दर देखकर जौहरी बनना चाहता हूँ । 
  
जीवन बड़ा विलक्षण है पता नहीं ये मेरा आत्मविश्वास है या अहंकार मैं समझ नहीं पाया पर इतना जरुर जानता हूँ कि हृदय से की गई मन्नत जरुर पूरी होती है जैसे मैं गुरूजी से मिला और जैसे मुझे जे.आर.एफ. मिला । पढ़ाई करते समय मन में ये विचार आता था कि अध्ययन के उच्च शिखर को प्राप्त करूँ जिसकी प्राप्ति हमें 27 वर्ष 11 माह और 17 दिन यानी 13 दिन शेष रहते हुए प्राप्त हुई क्योंकि सामान्य के लिए जे.आर.एफ. प्राप्त करने की उम्र सीमा अधिकतम 28 वर्ष निर्धारित है । इसे आप भाग्य, किस्मत या मेरा अपना अथक परिश्रम अथवा जो आपकी सोच हो वो मान सकते हैं क्योंकि तुलसीदास जी ने लिखा है- 
                    ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’। 
अभी रेलगाड़ी अजमेर पहुंची की गुरूजी का वातानुकूलित डिब्बे में प्रवेश हुआ । मैं काफी दूर था उनसे । आगे जब रेलगाड़ी कुछ दूर चलने के बाद रुकी तो भाई जी ने कहा की गुरूजी से मिलेंगे । तो मुझे लगा कि आज हृदयलालसा पूर्ण हुई । मैने कहा अब विलम्ब कैसा ? मैं उनके साथ हो लिया और वातानुकूलित डिब्बे में पहुँचकर जैसे ही मैने गुरूजी को देखा देखता ही रह गया जैसे अचानक बल्ब जलने से आँखें चौधिया जाती है ठीक उसी प्रकार से गुरूजी को देखकर हुआ । मैं थोड़ी देर तक उनको निहारता रहा और भाई जी हमारा परिचय कराते रहे । फिर मुझे लगा की ये सूरत मैंने कहीं देखी है तब एका-एक आजकल पत्रिका(अक्टूबर 2007) का ध्यान आया जो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जन्मशताब्दी विशेषांक के रूप में निकली थी जिस पर ऊपर तथा अन्दर कई चित्र द्विवेदी जी के थे उसी चित्र से हुबहू मिलती एक तस्वीर हमारे सामने विराजमान थी । मैं अचानक जागते हुए गुरु जी का चरण स्पर्श किया और उन्होंने हमें हृदय से आशीर्वाद दिया अब मेरे मन में दूसरा विचार चलने लगा की जब सूरत इतनी मिलती है तो कीर्ति में भी समानता खोजी जाय फिर हमने तुलना करना शुरु किया आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और साक्षात देवत्व की प्रतिमूर्ति डॉ. बद्री प्रसाद पंचोली जी की । किस्मत से गेंद दोनों हाथों के बीच में थी क्योंकि गुरूजी भी हमारे साथ होटल क्राउन में ही ठहरे थे । पर उनके साथ भाई जी और बिरमदेव जी थे इधर हमारे साथ अशोक कुमार मिल थे । अभी हम कमरे में पहुंचे ही थे कि हमने अशोक जी से कहा कि मैं गुरूजी के पास जाना चाहता हूँ और बिरमदेव को यहाँ भेजना चाहता हूँ, यह कहकर हम जैसे चलने को तैयार हुए ठीक उसी समय कमरे में बिरमदेव जी का प्रवेश हुआ और उन्होंने यह कहा कि हमें वहाँ रहने में असुविधा हो रही है इसलिए आप वहाँ चले जाइए । बिरमदेव ने तो हमारे मुख की बात ही छीन ली और हम तुरंत निकल दिए । कमरे में पहुँच कर हमने गुरूजी को फिर प्रणाम कर आशीर्वाद लिया । फिर हम तीनों दो लोगों के कमरे में तथा दो लोगों के बिस्तर पर आराम करने लगे हमने या गुरूजी ने कोई अलग से बिस्तर की मांग नहीं की । 

आपको हम यहाँ बताते चलें कि भोपाल में या कहीं पर गुरूजी को रुकने की कोई तकलीफ नहीं थी क्योंकि उनके शिष्यों और मित्रों की संख्या कम न थी पर गुरूजी भाई जी के पास ज्यादा स्वतन्त्र महसूस करते थे इसलिए उनका निर्णय यहीं रुकने को हुआ । एक बार तो प्रो.मोहन लाल छिपा (कुलपति, श्री अटल बिहारी बाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय) जी ने अपनी कार से गुरूजी को साथ में लेकर (हम भी साथ में थे) होटल क्राउन तक पहुचाने आये ।  गुरूजी के एक कथन से हमारे सोने में कमी आ गई हम रात में 2 से 3बजे के बाद ही सोते थे और सुबह 6 बजे उठ जाते थे । रात दो –तीन बजे के पहले गुरूजी से बात करना और बस बात करना क्योंकि गुरूजी ने हमें यह बताया था कि अगर मैं दस मिनट भी सो लेता हूँ तो मेरी नींद पूरी हो जाती है, बस फिर क्या था हम गुरूजी के साथ जागने लगे और जैसे गोदी का बच्चा माँ का स्तनपान करते समय ध्यान मग्न होता है और पेट की भूख शांत करते हुए आनंद उठाता है ठीक उसी प्रकार हम भी 83 वर्षों के अनुभव का रसास्वादन करने लगे । गुरूजी के साथ हमने किसी टीवी के संवाददाता की भाँति व्यवहार किया और उनके जीवन तथा विविध अनुभवों के बारे में जानने का प्रयास किया । और उन्होंने द्विवेदी जी की भांति हँसते और मुस्कुराते हुए हमारे एक-एक प्रश्न का उत्तर अपने संस्मरणों के द्वारा हमें प्रदान करते रहे । उनकी सहजता, साधारणता, उनका मुख पर हाथ रखकर खिलखिला कर हँसना, समय-समय पर विनोदपूर्ण उक्तियों से वार्तालाप को और अधिक रोमांचक बनाना ये सब बातें हमें उनकी तरफ चुम्बक की भाँति खींचने लगी । जैसे किसान जब खेत की सिचाई करता है तो पानी अन्दर-अन्दर मिट्टी को गलाते हुए ऊपर आता है और पूरा खेत पानी –पानी हो जाता है ठीक उसी प्रकार धीरे-धीरे हमारी और गुरूजी की गुप्तगू होने लगी और मैं अन्दर से भीगता रहा । आपको बताते चलें कि गुरूजी को मंत्रालय की तरफ से बुलावा आया था और एक दिन पहले ही उनका टिकट भी हुआ था । गुरूजी का कहना था कि बिना बुलाए कहीं नहीं जाना चाहिए । गुरूजी जब पहली बार विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन स्थल पर पहुँचे तो उनका ध्यान सर्वप्रथम मुख्य द्वार के ऊपर लिखे विश्व हिंदी सम्मेलन पर टिक गया और फिर जब उन्होंने उसकी व्याख्या की तो हम उनका मुख देखते रहे  । उन्होंने जो कहा वो इस प्रकार है गुरूजी ने देखा कि ऊपर लिखा था ‘10 वाँ वि श्व हिंदी स म्मेलन’ अर्थात दशवां विशेष कुत्तों का हिंदी सम्मेलन । अब आप समझ सकते हैं कि उनकी पारखी दृष्टि से सायद कोई बचा होगा । सबसे विशेष बात यह है कि वो महत्वपूर्ण बातें हमें अपने पास बुलाकर धीरे से हमारे कान में कहते और ठहाका मार कर हँस देते । गुरूजी ने हमें व्यक्ति के विषय में, समाज के विषय में, देश के संबंध में, हिंदी साहित्य के संबंध में तथा उन महान लेखकों के विषय में जिनसे उनका व्यक्तिगत परिचय था उन सबका जो हमारे लिए सुनना उचित था वो हमें अवगत करा रहे थे । हम भी उनका अपने परिवार का अंग समझ कर नहाने-खाने से लेकर पूरी दिनचर्या का ध्यान रखने लगे थे । आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि गुरूजी ने हमारे अन्दर कौन-कौन सी बातें और कितने प्रकार के रसों का आस्वादन कराया होगा । 

अंतिम समय जब हम लोगों को भोपाल से वापस आना था तो भाई जी गुरूजी की जिम्मेदारी हमारे ऊपर ही छोड़ गए क्योंकि उनको अजमेर न जाकर एका-एक दिल्ली जाना पड़ गया था ।भाई जी ने हमसे कहा कि गुरूजी को आप अजमेर स्टेशन पर उतार दीजिएगा और वहाँ पर गुरूजी को लेने उनके घर से कोई न कोई आ जाएगा, हमने उनको आश्वस्त किया आप निश्चिन्त रहें । हम सब साथ में स्टेशन पहुँचे और गुरूजी का टिकट दूसरे डिब्बे में था उस दिन और रेलगाड़ी पकड़ने से पहले ही बारिश शुरु हो गई थी बहुत परेशानी हुई लगभग सब भीग गए थे और सामान भी अस्त-व्यस्त हो गया था । गुरूजी को हम सभी ट्रेन के अन्दर बैठा दिए मगर वो अपनी शीट पर ही जा कर बैठे वो हम सब से अलग हो गए थे इसलिए हमने उनको अपनों के  बीच में लाकर बैठाया और वहाँ गुरूजी की शीट पर दूसरे व्यक्ति को । अब हमारे मन में एक संशय बार-बार उठता रहा कि अब कुछ समयांतराल के बाद गुरूजी हमसे दूर हो जाएँगे फिर क्या था हम पूरी रात सुबह 5 बजे तक गुरूजी से बात करते रहे और सब सोते रहे । 

यहाँ पर हम आपको एक रोचक बात और बताना चाहेंगे कि ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे में राठौर ‘सर’ और डॉ.जितेन्द्र ‘सर’ भी थे तो हम उनके पास भी आते जाते रहते थे । उसी समय हमने विश्व हिंदी सम्मेलन का एक थैला देखा तो जिज्ञासा हुई की इनसे भी परिचय करना चाहिए फिर क्या था हम उनके पास जा पहुँचे और उनसे बात करके उनको अपने सर जी के पास लेकर आ गए फिर उन्होंने जो अपना परिचय कराया वो इस प्रकार है । उन्होंने बताया की वो विश्व हिंदी सम्मेलन में एक कवि के रूप में बुलाए गए थे पर मध्य-प्रदेश में बम विस्फोट हो जाने से यह कवि सम्मेलन अस्थगित कर देना पड़ा । उन्होंने अपना नाम डॉ. रमेश उपाध्याय ‘बाँसुरी’ बताया । और भी उन्होंने अपने विषय में काफी कुछ बताया । फिर हमने कवि जी से निवेदन किया कि  जब आप को वहाँ कविता सुनाने का अवसर नहीं मिला तो कृपा करके यहीं महफ़िल जमा लेते हैं और हम सब आप की कविता का रसास्वादन लेते हैं । कवि जी बहुत ही सरल स्वभाव के थे और तुरन्त तैयार हो गए । कवि जी के साथ- साथ सभी लोग आमने सामने शीट पर थे और हम रेलगाड़ी के फर्श पर विराजमान थे और कवि जी की सुनाई गई कविता को हम मोबाइल में रिकार्ड कर रहे थे । ये ‘रेलागाड़ी में कवि सम्मेलन’ लगभग रात 11बजे तक यानि 2 से 3 घंटे चला । फिर सब लोग सोने की तैयारी करने लगे हम भी वहाँ से गुड नाईट की फार्मेल्टी पूरी करते हुए विदा हुए और गुरूजी को रात भार सोने नहीं दिया सुबह 5 बजे लगा की गुरूजी सोना चाहते हैं तब हम उनके पास से हटकर सोने चले गए । सुबह का दैनिक कार्य करते हुए फिर चर्चा परिचर्चा का दौर जारी हुआ और वो अजमेर तक चला । हम भी गुरूजी से 'सिर में पड़े जुएँ' की भाँति चिपक गए थे जो उनके अन्दर विद्यमान सारे ज्ञान को पी जाना चाहते थे । 

अजमेर स्टेशन आ जाने पर हमने गुरूजी को रेलगाड़ी से बाहर उतारा और उनको जिनके साथ जाना था उनका इंतजार करने लगे । फोन पर फोन कर के पता लगाने लगे की कहाँ पर हैं पर रेलगाड़ी चलने को हो गई और कोई नहीं आया मैं स्टेशन से बाहर भी जा कर देख आया पर कोई दिखाई नहीं दिया तब गुरूजी को हमने बताया की सायद कोई आया नहीं आप क्या करेंगे तो उनका जबाब था की नहीं कोई न कोई आया होगा जरूर इसलिए आप जाइए हम चले जाएँगे । मगर हमारी आत्मा तैयार नहीं हुई की गुरूजी को अकेला छोड़कर हम चले जाएँ । तत्काल हमने निर्णय लिया की अब हम गुरूजी को अपने साथ लेकर उनके घर जाएँगे । रेलगाड़ी चलने पर हमने अशोक जी तथा अन्य लोगों से कहा की आप हमारा सामान याद करके विश्वविद्यालय ले जाइएगा और हम गुरूजी को उनके घर पहुंचाकर ही आएंगे । रेलगाड़ी चली जाने के बाद हम गुरूजी को साथ लेकर उनके घर पहुँच गए । गुरूजी जैसे ही घर में प्रवेश किए वैसे ही हमें बैठा कर रसोई में गए और हमारे लिए अपने हाथ से पानी लेकर आये फिर कहे की आप तो वाराणसी से हो आपको मीठा भी चाहिए और फिर वही हँसी हँसते हुए रसोई से मीठा भी लेकर आ गए और हम बस गुरूजी!!!!!कह कर रह गए । उन्होंने कहा कि हमें पता है की बनारस वालों का आतिथ्य सत्कार कैसे किया जाता है । फिर हम मौन होकर उनके आतिथ्य सत्कार को स्वीकार करने लगे । हम चाय नहीं पीते ऐसा उन्हें पता था इसलिए घर में जो सबसे बड़ा गिलास था उसमें दूध लेकर हमारे सामने रख दिया गुरूजी का आदेश गुरूजी के घर में अस्वीकार कैसे कर सकते हैं बस दबी जुबान में विरोध करते रहे । यहाँ आपको सुनकर आश्चर्य होगा की घर में हमारा सत्कार करने वालों की कमी नहीं थी पर गुरूजी ने किसी को आदेश नहीं दिया और खुद रसोई से लाकर हमारे सामने परोसते रहे बस यही बात हमें तकलीफ देती रही की कहाँ आकर फंस गया मैं कि 83 वर्ष के महान व्यक्ति से मेहमाननवाजी करा रहा हूँ । हाथ मसल-मसल के रह जाता था और जैसे कुछ कहता तो तुरंत ही मौन का इशारा मिल जाता और मैं तिलमिला कर रह जाता । यही काम कोई और करता तो इतनी तकलीफ न होती । जब मेहमाननवाजी समाप्त हुई तो मैं उनके परिवार से भी मिला जो वहाँ उपस्थित थे और मैं गुरूजी की बहू जी के साथ किशनगढ़ तक भी आया । अजमेर से किशनगढ़ तक का किराया मैंने नहीं दिया । आगे चलकर और भी दुख तब हुआ जब हम गुरूजी से विदा लेने के लिए उनका चरण स्पर्श करने लगे । सर्वप्रथम उन्होंने हमें अपनी पुस्तक ‘जीवन शतपथ’ पर हमारा नाम लिखकर भेंट दी । यह हमारे लिए किसी राष्ट्रपति पुरस्कार से कम नहीं था यहाँ मेरे नेत्र सजल हो उठे । मैं कुछ कह न पाया बस यही सोच कर की हिंदी सेवा करने हेतु बढ़ा मेरा कदम आज प्रथम पुस्तक पाकर धन्य हो गया । आगे जो घटना घटी उसको देखकर मैं खिसिया सा गया और अन्दर ही अन्दर क्रोधित भी क्योंकि गुरूजी ने अपनी जेब से निकाल कर हमें 500 रूपए देने लगे तो मैने कहा ये किसलिए तो उनका उत्तर था कि मैं भोपाल के पहले दिन से ही देख रहा हूँ और आपको सफाई देने की जरुरत नहीं है । तो मैंने बस इतना कहा कि गुरूजी इसका मतलब हमारा कोई कर्त्तव्य नहीं था आपके प्रति ? गुरूजी आपने हमारे द्वारा किये गए सभी कार्यों पर पानी फेर दिया इस कारण मैं आप से बहुत नाराज हूँ । फिर मैने सोचा चलो जाते-जाते गुरूजी को नाराज नहीं करते हैं और हमने उसमें से 100 रुपया अपने लिए निकाला और बाकी गुरूजी को दे दिया पर गुरूजी ने यह कहते हुए की जब आप इतने नाराज हैं तो चलो हम आपकी ही करते हैं और उन्होंने 100 रुपया लिया और 400 रुपया हमें देते हुए ये कहा की बस अब बहुत हो चुका अब विदा लीजिए । हमारे आँसू पलकों के बीच आकर अटक चुके थे और हम बाहर जा चुके थे । 

कुछ समय बाद भाई जी ने ही हमें बताया कि गुरूजी जब से भोपाल से घर आये हैं तब से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था तो एक दिन घर वालों ने उनको अस्पताल में ले जाकर जाँच करवाई तो वहाँ पता चला की इनको तो कुछ दिन पहले ही हृदयाघात हो चुका है ये तो ईश्वर का संयोग है की इनको कुछ हुआ नहीं । हम सुनें तो अवाक! और जब हम दोनों ने गुरूजी के विषय में ध्यान लगाया तो पता चला कि पहले दिन जब वो रुके थे और बाहर भोजन कर के वापस होटल पहुँचे थे तो उन्होंने कहा था कि आज जिह्वा का स्वाद कुछ बदला सा है और फिर उनकी आवाज में भी भारीपन आ गया था पर वहाँ पर वो भी और हम सब भी कोई ध्यान नहीं दिए । प्रभु ने हम सबका साथ दिया इसके लिए हम सदा गुरूजी के ऋणी रहेंगे हम दोनों बहुत बड़े अपयश से बच गए । कई दिनों तक नहीं बल्कि आज भी समय-समय पर गुरूजी की वह पवित्र और हंसमुख तस्वीर मानस पटल पर अंकित होते ही ह्रदय रोमांचित हो उठता है । हमने भाई जी से कई बार गुरूजी ले मिलवाने के लिए कहा पर संयोग नहीं बन सका अभी तक । गुरूजी के साथ बिताए गए उन पलों को जब हम स्मरण में लाते हैं और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी से मन ही मन तुलना करते हैं तो दोनों एक लगते हैं और फिर हमारी मान्यता के अनुसार पुनर्जन्म सिद्ध हो उठता है । 

गुरूजी के साथ 6 दिन रहने के बाद हमें यह महसूस हुआ की बड़े भाई अखिलेश जी गुरूजी के जीवन से कुछ कम सीख पाए हैं और हम उनसे आग्रह करते हैं कि जो समय आगे गुरूजी के सानिध्य में रहने का उनको प्राप्त हो उससे वो अवश्य सीख लें क्योंकि जब 83 वर्ष की उम्र में भी उनको कहीं किसी से कोई गिला शिकवा नहीं तो फिर हम सब तो अभी युवा हैं । और अंत में मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि बुजुर्गों के पास से लिया गया अनुभव और नसीहत किसी आयुर्वेद औषधि से कम नहीं क्योंकि इसके सेवन से कोई दुष्प्रभाव नहीं होता यानी जिसे अंग्रेजी में कहते हैं ‘नो साइड इफेक्ट’ ।      
  धन्यवाद !                                                                                         

सर्वेश कुमार मिश्र
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
किशनगढ़, अजमेर, राजस्थान ।
चलभाष संख्या – ९५५९६३६७३६,
                                       

नींद (लघुकथा )

मनोहर की मिठाई की दुकान रात के 10 बजे बंद हो जाने पर चारों तरफ सन्नाटा छा जाता है । और दुकान के सभी मजदूर वर्ग सुबह के इंतजार के लिए सो जाते हैं । उन्हीं के बीच एक सोलह वर्ष का लड़का रात भर जागता रहता है । उसे नींद नहीं आती पर दिन में काम करते समय उसे नींद आती है, तो मालिक से वह प्रताड़ित होता रहता है । एक दिन डाक विभाग के माध्यम से वायुसेना का बुलावा पत्र कमलेश के नाम आता है । यह वही कमलेश है जिसको रात में नींद नहीं आती थी । वायुसेना में जाने की प्रक्रिया से वह गुजरता है । पर अचानक थाने की रिपोर्ट से पता चलता है कि उसके ऊपर F.I.R.दर्ज है जो उसके चाचा द्वारा दर्ज कराया गया है । कमलेश को जब इस बात का पता चलता है तो वह कभी मालिक से प्रताड़ित नहीं होता क्योंकि रात में वह गहरी नींद में सोने लगता है ।



सर्वेश कुमार मिश्र
शोधार्थी, हिंदी विभाग
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय
बांदरसिंदरी, अजमेर।
मो. 09559636736
                                                                                                 Email-curajskmishra@gmail.com

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

‘दुखवा मैं कासे कहूँ सजनी’ का यथार्थ बना ‘रघुनाथ’






कुछ लिखूँ मैं अपनी कलम से इसके पहले मुझे महाप्राण निराला की ‘सरोज-स्मृति’ की वह पंक्ति याद आती है कि “ दुःख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही ।”1 काफी दशक बीत जाने के बाद भी वृद्धों के जीवन से दुःख कैसे चिपक जाता है उसकी एक बानगी हमें काशीनाथ जी के उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू’ में देखने को मिलता है । काशीनाथ जी जब यह घोषणा करते हैं कि “अगर ‘काशी का अस्सी’ मेरा नगर था तो ‘रेहन पर रग्घू’ मेरा घर है, सायद आपका भी ।” तो जाहिर है कि लोगों ने इसे काशीनाथ जी के घर की दास्तान समझ ली जो कि ऐसा दूर तक नहीं दिखाई पड़ता, हाँ जब हम इसे बड़े फलक पर देखते हैं तो यह ग्रामीण समाज व पुरानी मानसिकता से बंधी पीढ़ी में अवश्य परिलक्षित होती है । ‘रेहन पर रग्घू’ में कथानायक रघुनाथ की जो दशा चित्रित की गयी है या उनके परिवार के सदस्यों को जिस रूप में दिखाया गया है वह वर्तमान के सन्दर्भ में सत्य प्रतीत होता है । आज समाज इसी प्रकार की विसंगतियों का शिकार हो रहा है । गोपेश्वर सिंह ने ‘रेहन पर रग्घू’ के सन्दर्भ में कहा है कि “महात्मा गांधी ने कहा था कि मैं घर की खिड़कियाँ खोलकर रखना चाहता हूँ ताकि बाहर की हवा आए, लेकिन इतना नहीं कि तेज अंधड़ में मेरा घर और मेरे घर की चीजें उड़ने लगें । हमारे राष्ट्रीय और सामाजिक संबंधों में बाहरी लोगों के संपर्क से अनेक बदलाव आये । प्राचीन काल से अंग्रेजों तक अनेक जातियों के आक्रमण और संपर्क का गवाह रहा है हमारा समाज । उस संपर्क के कारण हमारे राष्ट्रीय-सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में अनेक तरह के बदलाव आये । वे बदलाव स्वाभाविक संपर्कों की परिणति थे । लेकिन पिछले दो दशकों में नयी आर्थिक नीति के आने के बाद जितनी तेजी से बदलाव की हवा चली है वह किसी आँधी से कम नहीं । हमने अपने घर की खिड़कियाँ दरवाजे खोल रखे हैं और तेज आंधी में हमारे घर की सारी चीजें उड़ने लगी है । रघुनाथ और उनका घर इस आँधी में तहस-नहस हो जाता है भूमंडलीय व्यवस्था में आदमी के अकेले पड़ते जाने की इतनी मार्मिक कथा रचना अभी हिंदी में नहीं लिखी गयी ।”2 आइये अब आगे बढ़ते हुए उपन्यास को संक्षेप में इस प्रकार देखते हैं – एक सौ चौसठ पृष्ठों का यह उपन्यास आकार में लघु पर रग्घू की विडंबना देखकर यह काफी व्यापक हो जाता है । पूरी कथा रघुनाथ और उनके परिवार के चारों तरफ घूमती है । परन्तु इस घूमने की प्रक्रिया का जो केंद्र है वह रघुनाथ ही है । पूरी कथा पहाड़पुर गाँव तक सीमित न होकर बनारस,नोएडा, रांची यहाँ तक कि अमेरिका भी पहुँच गयी है । यही भूमंडलीकरण की कथा बन गयी । आकर में छोटा पर पूरा महाकाव्य छिपाए हुए यह उपन्यास हिंदी उपन्यास की दुनियां में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । क्या कुछ नहीं बदला इधर के वर्षों में । तेजी से आये इस बदलाव ने हमारे परिवार और समाज के परंपरित ढाँचे को हिलाकर रख दिया । देखते-देखते हमारा पुराना ढाँचा टूट चूका है । नया जो बन रहा है वह इतना आत्मकेंद्रित,जड़विहीन और निर्मम है कि उसमें रघुनाथ जैसे लोगों के लिए जगह नहीं है । रघुनाथ निहत्थे और अकेले हैं । उनका परिवार कहने को तो है पर बाहरी रूप से, अन्दर कोई जुड़ाव नहीं । बड़ा बेटा कॉलेज मैनेजर की बेटी से शादी नहीं करता, इसलिए वे कॉलेज से निकाल दिए जाते हैं । बेटा अमेरिका चला जाता है । वहाँ वह और बेहतर कैरियर की तलाश में दूसरी औरत से जुड़ता है और अपनी पत्नी को छोड़ देता है । उसकी पत्नी विवश हो बनारस लौटती है । दूसरा बेटा प्रतियोगिताओं के नाम पर आँख में धूल झोंकता है और अंततः नोएडा में एक कारपोरेट हाउस में काम करने वाली एक बच्चे की माँ के साथ ‘लिविंग टुगेदर’ का जीवन जीने लगता है । बेटी पढ़ लिखकर नौकरी करती है, पर रघुनाथ जहाँ चाहते हैं वहाँ शादी नहीं करती । वह जिस दलित युवक से शादी करना चाहती है, उससे रघुनाथ संस्कारवश नहीं स्वीकार करते । वह शहर में अकेले रहती है और दलित युवक के साथ सहजीवन स्वीकार कर लेती है । गाँव में रघुनाथ अपमानित होते हैं । आदरणीय समझे जाने वाले रघुनाथ का साथ कोई नहीं देता । गाँव में नया घर बनाने बेटा-बेटी की शादी धूम धाम से करने, और पोता-पोती को देखने की रघुनाथ की साध धरी रह जाती है, गाँव जब रहने लायक नहीं रह जाता, तब वे बनारस बड़े बेटे की परित्यक्ता पत्नी के पास जाते हैं । पहाड़पुर और बनारस यानि गाँव और शहर तक फैली इस कथा के नायक रघुनाथ की अजीब और विवश दास्तान को पढ़ते हुए मुझे स्वीकार करने में थोड़ी हिचक होती है पर जब आज मैं अपने गाँव और नित सुबह अखबार में दो चार खबरों से रूबरू होता हूँ तो कुछ भी भ्रम नहीं रह जाता । आज वास्तव में सारे सम्बन्ध इतनी तेजी से बदल रहें हैं । भूमंडलीकृत व्यवस्था के तहत बदलाव तो आया है लेकिन इतनी तेजी से आया है, यह उपन्यास पढ़कर महसूस हुआ । इस बदलाव के कारण हमारी दुनिया कितनी निर्मम, आत्मकेंद्रित, जड़ विहीन और सन्वेदनशील हो गयी है । इसकी दिलचस्प और प्रामाणिक कथा है –‘रेहन पर रग्घू’ ।
          सदाशिव श्रोत्रिय का मानना है कि “आर्थिक समृद्धि के साथ ही चिकित्सा भोजन और जीवन पद्धति में सुधार ने जहाँ एक ओर मध्यवर्गीय लोगों की जीवन प्रत्याशा में वृद्धि की है वहीं दूसरी ओर सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों के परिवर्तन ने उनकी वृद्धावस्था के लिए कई नई समस्याएं उत्पन्न की हैं । आज के तेजी से बदलते हालात में वृद्धों की स्थिति में आ रहे इन परिवर्तनों को संवेदना पूर्ण ढंग से चित्रित करने का काम काशीनाथ सिंह ने ‘रेहन पर रग्घू’ में किया है ।”3 आज की नई पीढ़ी जो कृतघ्न एहसानफरामोश है वह कैरियर बनाने के चक्कर में प्यार-व्यार का सौदा करने में नहीं हिचकती । वस्तुतःबढ़ते हुए व्यक्तिवादी सोच ने आज हमारे पारंपरिक वैवाहिक ढाँचे को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है । पिछले 15-20 वर्षों में वैवाहिक संस्था सबसे अधिक दरकी है । खास कर उस समाज में जहाँ शिक्षा ने धन कमाने का तिकड़म दिया है । स्त्री चेतना और बाजार के प्रभाव ने पुरानी व्यवस्था को लगभग ध्वस्त कर दिया है । रघुनाथ की बेटी सरला दहेज के चक्कर में पिता को परेशान होता देखती है तो अंतरजातीय प्रेम विवाह के पक्ष में पिता के सामने अपना तर्क पेश करती है – “आप दूसरों की शर्तों पर शादी कर रहे थे, यहाँ मैं करुँगी लेकिन अपनी शर्तों पर, आप मेरी ‘स्वाधीनता’ दुसरे के हाथ बेंच रहे थे, हाँ मैं भविष्य देख रही हूँ, जहाँ स्पेस ही स्पेस है ।”4 सरला जहाँ अपने भविष्य में ‘स्पेस’ ही ‘स्पेस’ देख रही है वही रघुनाथ के भविष्य में अन्धकार भरता जा रहा है सुदेश भारतीय का नाम सुनते ही रघुनाथ खटिया पर पसर गए और दोनों हाथ उठाकर बोले — “हे भगवान ! यह क्या कर रहे हो मेरे साथ ! लाला तक गनीमत थी लेकिन अब ? मैं क्या करूँ ? किसे मुख दिखाऊं ? वे पागल की तरह अनाप सनाप बक-झक करने लगे ।”5 पहाड़पुर गाँव में कथानायक रघुनाथ एकमात्र पढ़े-लिखे आदमी थे जो संघर्ष करते हुए एक कॉलेज की अध्यापकी तक पहुंचे थे । पहले साइकिल से और बाद में स्कूटर से कॉलेज आने-जाने लगे । वह उसी मध्यवर्ग के प्रतिनिधि हैं जो नित नए सपने देखता है । उन्होंने दबे कुचले दलितों की शक्ति को भाँप लिया था इसलिए चमटोल के हलवाहे जब हड़ताल की धमकी दे रहे थे तभी रघुनाथ ने ठाकुरों को समझाया था कि मजदूरी बढ़ाने की उनकी मांग जायज है । यह उनका हक है । उन्होंने सुझाव भी दिया था—“या तो उनकी मांगों पर सहानभूति के साथ विचार करें या फिर एक ट्रैक्टर खरीदें ! और चूंकि हममें से कोई एक इस हैसियत में नहीं है कि अकेले खरीद सकें  इसलिए हल पीछे दाम बाँध दें । सब लोग मिलकर खरीदें ।”6 यह समस्या का उचित समाधान हो सकता था लेकिन ठाकुरों के सामने यह समस्या उठ खड़ी हुई कि इसे चलाएगा कौन ? हैल्पर और खलासी भी तो चाहिए । रघुनाथ ने इसका समाधान भी ढूँढ़ निकला—यहाँ पर रघुनाथ जी बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हुए कहते हैं “अपने ये लड़के जो पिछले सात-आठ साल से कंपटीशन के नाम से गाँव से नगर और नगर से गाँव मोटर साइकिल पर मटरगस्ती कर रहे हैं ! जब नौकरी का कोई ठिकाना नहीं तो यही करें ।”7 यह सुनते ही उनके चहरे तमतमा उठे ! आँखें लाल हो गयी । वे बुजुर्गों के सामने कसमसाकर रह गए । सबसे मानिंद बुजुर्ग बब्बन कक्का को भी यह सुझाव रास नहीं आया । क्या विडम्बना है कि जाति वर्ण विभाजित सामंती समाज व्यवस्था में शारीरिक श्रम को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है । हल की मूठ पकड़ना तो सवर्ण समाज के लिए  अपमानजनक था ही, अब ट्रैक्टर चलाने में भी वे अपनी हेठी देख रहे थे जिसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा ।
काशीनाथ सिंह ने पिछड़ों और दलितों में स्वाभिमान का नया प्रकाश तथा रघुनाथ को साथ रखते हुए सामाजिक आर्थिक पतन को भी दर्शाया है । रघुनाथ अपनी जमीन पिछड़ी जाति के स्नेही को बटाई पर इसलिए देते हैं कि वह मेहनती और ईमानदार है । इसकी प्रतिक्रिया ठाकुरों में होती है । जग्गन जब रघुनाथ से इस सन्दर्भ में कुछ कहता है तो रघुनाथ उनको टका सा जबाब देते हैं वे कहते हैं –“देखो जग्गन, फालतू हैं ये बातें । समय बहुत बदल गया है । आज मानसिक रूप से विकलांग ही ऐसी बातें करते हैं । किस बात के बड़े हैं हम तुम ? पुरखों की जमीन और जाति के भरोसे ? छब्बू की हत्या के बाद भी यह भ्रम तो पाले ही रहो । पिछले दिनों तुमने ही अपने खेत बेचे, ठाकुरों में से किसी ने क्यों नहीं खरीदा ?...।”8  यहाँ रघुनाथ का जो भी उपदेश है वो परिवर्तन की झलक तो जरूर देता है पर घर में आने पर सब उपदेश धरे के धरे रह जाते हैं । पारिवारिक विघटन में छोटे बेटे धनंजय की भूमिका भी कम कष्टदायक नहीं थी । जो डोनेशन देकर सीधे मैनेजर बनने का ख्वाब देख रहा था । जब प्रो सक्सेना ने धनंजय के हाथ समधी रघुनाथ के लिए पांच लाख रुपये भिजवाये तो धनंजय ने उसमें से चालीस हजार मोटर साइकिल के लिए रख लिए और बाकी रुपए भी बाद में डोनेशन के नाम पर लड़-झगड़ हड़प लिए । किसी को पता नहीं की उसका एडमिशन हुआ या नहीं ! सोनल के बुलाने पर एक बार अशोक विहार आया भी तो ठहरा एक होटल में किसी लड़की के साथ जिसकी एक बेटी भी थी । पूछने पर पता चला कि दोनों के बीच वैवाहिक संबंध जैसा कोई रिश्ता नहीं है बल्कि दोनों को एक दूसरे की जरूरत है इसलिए  एक साथ रहते हैं । उसके आने की खबर पाकर रघुनाथ जान-बूझकर पहले ही पहाड़पुर चले गए थे कि देखें बाप से मिलने पहाड़पुर आता है या नहीं । धनंजय पहाड़पुर नहीं गया तो नहीं गया ! अत: अपने को तबाह कर दोनों बेटों में अपना उज्ज्वल भविष्य देखने वाले रघुनाथ पूरी तरह टूट चुके थे । बिना रिश्ते के सहजीवन की पश्चिमी प्रवृत्ति अब भरतीय समाज में भी आ रही थी ।
घर का मुखिया कितने अरमान संजोता है अपने जेहन में कि हमारा एक संस्कारयुक्त परिवार हो, बच्चे अच्छी से अच्छी जगह नौकरी करें, घर में संतोष से दो जून की रोटी मिलती रहे, घर के आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूंजती रहे, बहुओं के पायल में पड़ी घुन्घुरुओं की आवाजों से घर का वातावरण संगीतमय बना रहे । अगर मुखिया एक गिलास पानी मांगे तो उसके सामने लोटा भर पानी रख दिया जाय । यही तो सोचते थे हमारे बुजुर्ग, पर आज के समय को देखते हुए जो उपभोक्तावादी नई संस्कृति पैदा हुई है उसने तो पूरी सोच को ही बदलकर रख दिया है । हर नया आदमी पैसे और अपनी सुख-सुविधा के पीछे इस प्रकार दौड़ लगा रहा है कि वह यह भूल गया है कि वह पृथ्वी पर आया कैसे ? किसके सपनों ने उसे इस काबिल बनाया ? आज के पिता-पुत्र जब आपस में कोई विवाद करते हैं और इस पर जब पिता यह कहता है कि मैनें तुमको पैदा किया है तो इस पर पुत्र का जबाब होता है कि आपने हमें पैदा नहीं किया बल्कि आप मजे ले रहे थे और हम गलती से आ गए इसलिए एहसान जताना छोड़िये । आज देश में वृद्धों की संख्या के साथ-साथ वृद्धाश्रमों की संख्या भी तेज गति से बढ़ रही है । वृद्धाश्रमों में जाकर जब आप यह जानते हैं कि यहाँ पर जो वृद्ध लोग हैं इनके बच्चे गरीब नहीं हैं बल्कि कोई आईएस है तो कोई खरबपति है परन्तु इन बुजुर्गों के लिए उनके पास कोई जगह नहीं । आज की शिक्षा को देखते हुए ऐसा लगता है कि जो शिक्षित नहीं हैं उनके पास भरा-पूरा परिवार है और बुजुर्ग लोग वहाँ पर आनंद से जीवनयापन कर रहे हैं । आज समाज में अगर कोई संयुक्त परिवार है तो जो दो कदम आगे निकलकर अच्छी डिग्रियाँ ले लिए हैं वो इस परिवार को पिछड़ा बताते हैं और कहते हैं कि ऐसे लोग कभी आगे नहीं बढ़ सकते । आज रघुनाथ की भी यही स्थिति है तीनों बच्चों को पढ़ा लिखाकर पैरों पर खड़े होने के काबिल बनाया तो ऐसे खड़े हुए की पिता के आगे कभी कहीं झुके नहीं और रघुनाथ ऐसे झुके की  फिर कभी उठे नहीं । उनके बच्चों द्वारा ऐसा शूल मिला जिसे न किसी को दिखा सकते थे न अन्दर घुसा सकते थे ।
और अंत में चौथीराम यादव के शब्दों में “सामंतवादी और पूंजीवादी संस्कृतियों की टकराहट में किसान संस्कृति पिस रही है । प्रेमचंद के किसान आज लाखों की संख्या में आत्महत्याएं कर रहे हैं । आधुनिकीकरण के चलते गाँवों में होने वाले बदलाव को लेखक ने पहाड़ पुर के माध्यम से देखने का प्रयास किया है । रेहन पर रग्घू इन्हीं दो संस्कृतियों के द्वंद्वात्मक संघर्ष और किसान संस्कृति के उजड़ने का महा आख्यान है और रघुनाथ इसके महानायक ।”9      
सन्दर्भ-
1.      शर्मा रामविलास, ‘राग विराग’, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, लोक भारती प्रकाशन, महात्मा गांधी मार्ग इलाहाबाद, प्र.सं.2010,पृष्ट 91
2.      ‘चौपाल’ संपादक, कामेश्वर प्रसाद सिंह, अंक :1,वर्ष 1, पृष्ट 58
3.      ‘चौपाल’ संपादक, कामेश्वर प्रसाद सिंह, अंक :1,वर्ष 1, पृष्ट 73 
4.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 54
5.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 52 
6.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 62 
7.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 62 
8.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 98 
‘चौपाल’ संपादक, कामेश्वर प्रसाद सिंह, अंक :1,वर्ष 1, पृष्ट 31
शोध विषय पर शोध-पत्र 
सर्वेश कुमार मिश्र
शोधार्थी, हिंदी विभाग
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय
बांदरसिंदरी, अजमेर।
मो. 9559636736
                                                                                                  Email-curajskmishra@gmail.com  

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

एक चुटकी सीधा



( संस्मरण का एक अंश )
सर्वेश कुमार मिश्र शोधार्थी (हिंदी विभाग)
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय किशनगढ़, अजमेर, राजस्थान ।

बात 72 वर्ष पुरानी, सन 1945-46 ई. के लगभग की है । तब हमारे आराध्य बाबा स्व. फुन्नन मिश्र जी की उम्र लगभग 19 वर्ष थी । बाबा जी का जन्म 12 दिसम्बर 1927 ई. को ईशापुर ग्राम में हुआ था । इनके पिता पण्डित हरगोविन्द मिश्र जी प्रकाण्ड विद्वान और ज्योतिष के अच्छे जानकार थे । पूरे गाँव में उनके सामने कोई सर उठाकर बात नहीं कर सकता था और चेहरा ऐसा था कि जैसे लगता था मानो कि अभी खून टपकने लगेगा । 6 से 7 फिट ऊँचे कद-काठी के धनी, पूरे गौरांग थे बाबा । कहीं भी आना जाना हो वो हमेशा खडाऊं ही पहनते थे । उनके बारे में आज भी जब कभी कोई चर्चा होती है तो बताने वाला व्यक्ति उत्साह से भर जाता है चाहे उसकी उम्र 98 वर्ष (श्री रमाशंकर यादव मास्टर के बाबा) क्यों न हो । चलिए काम की बात करते हैं, बखान करते आज तक कब पन्ना भरा है । हमारे बाबा (स्व.फुन्नन मिश्र) के जीजा (स्व. महादेव तिवारी) जी 1945 ई. से पहले ही मुंबई (तब बम्बई) में अध्यापक बन चुके थे । उनका ध्यान जब बाबा जी कि तरफ गया तो उन्होंने उन्हें मुंबई बुला लिया । उस समय बाबा कक्षा 7 पास किए थे । बाबा किसी तरफ सायद अकेले मुम्बई पहुँच गए । मन तो लग नहीं रहा था गाँव की गुल्ली-डंडा की याद रह-रह कर सताने लगती तो विचलित से हो जाते ।

एक दिन कहानी नया मोड़ लेती है इन लोगों के बीच प्रगट होते हैं ठाकुर गंगा प्रसाद सिंह । ये भी रोजगार के सिलसिले में मुंबई पहुँच गए थे । हमारे हिंदी साहित्य के इतिहास को अपनी पीठ पर उठाने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल के परम शिष्य थे ठाकुर गंगा प्रसाद सिंह । इनकी आज भी जब गाँव के लोग चर्चा करते हैं तो प्यार से गंगा बाबा ही कहते हैं । अपने समय में इन्होंने भी संघर्ष किया है । गंगा बाबा जब मुंबई में थे तो उस समय के जाने माने बिड़ला परिवार से उनका सम्बन्ध था । गंगा बाबा उनके बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करते थे । यहाँ तक की हमारे गाँव ईशापुर में बिड़ला जी के बच्चे गंगा बाबा के साथ आकर 2-3 महीने रहे हैं । गंगा बाबा ने अथक परिश्रम करके अपने गाँव में पहला स्कूल (तिलक स्मारक इण्टर कालेज, अमाँवाखुर्द, ईशापुर, जौनपुर, उत्तर-प्रदेश) खोला । गंगा बाबा काफी समय तक ‘श्री गांधी स्मारक इण्टर कालेज समोधपुर जौनपुर उ.प्र’ के प्रधानाचार्य रहे । उनके अनुशासन को अगर पास से देखना हो तो आप समोधपुर का भ्रमण कीजिए और कहीं टहलते हुए वहाँ के वर्तमान प्रधानाचार्य श्री रणजीत सिंह गुरु जी मिल जाएं तो समझो आपको गंगा बाबा का अनुशासन मिल गया । कितनी सरकारें आई और गई पर आज भी समोधपुर में नक़ल नहीं होती । हाँ समोधपुर को बदनाम करने वाले आपको एक दो जरूर यह कहते मिल जाएंगे कि ‘नक़ल होती है पर किसी को पता नहीं चलता ।’  पर मुझे आज तक ऐसा आभास नहीं हुआ क्योंकि उ.प्र सरकार ने प्रधानाचार्य श्री रणजीत सिंह गुरु जी को पुरस्कृत कर चुकी है । लग रहा है फिर भटक गया, अच्छा ! तो मैं मुंबई में था बाबा जी लोगों के साथ । हुआ ये कि गंगा बाबा एक दिन आ गए फूफा जी यानी हमारे बाबा के जीजा जी के कमरे पर । वहाँ पर गंगा बाबा ने हमारे बाबा को देखा पर हमारे बाबा उनसे आँख न मिला सके । तो उन्होंने फूफा जी से पूंछा कि- ये पंडित जी यहाँ क्या कर रहे हैं ?  फूफा जी ने गंगा बाबा को बताया कि इनको नौकरी दिलाने के लिए बुलाया है । तो गंगा बाबा जी ने तुरंत कहा कि तो गाँव में पुरोहिती कौन करेगा, पण्डित हरगोविन्द जी के बाद ? इस पर बाबा जी के जीजा जी ने कहा कि – “ बाबू साहब !!! अब एक चुटकी सीधा से ब्राहमण का पेट नहीं भरेगा ।” गंगा बाबा निरुत्तर हो गए । और उन्होंने हमारे बाबा जी को आशीर्वाद दिया और जीजा जी से कहा कि “अतिशीघ्र इनको नौकरी दिलाओ हम भी देखते हैं कहीं अगर मिलती है तो ।”

हमारे बाबा जी कक्षा सात पास होकर म्युनिस्पैलिटी में ही हेड-मास्टर बनकर सेवानिवृत हुए । और आज हम पी-एचडी करने के बाद भी ये आशा नहीं कर पा रहे कि हमारी नौकरी पक्की है । कौन बताए प्रधानमंत्री मोदी जी को कि हमारा भारत कितना बदला है कि योग्यता सड़कों पर भीख माँगने को मजबूर हो रही है आपके डिजिटल इण्डिया में ।
                                                                 ।। इति सिद्धम् ।।
लेखक- सर्वेश कुमार मिश्र
ग्राम/पोष्ट ईशापुर, जौनपुर, उ.प्र
दिनांक- 16 सितम्बर 2017
वार- शनिवार, प्रात: 4 बजे 

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

कितनी बार उसने पंख फड़फड़ाया होगा




कितनी बार उसने पंख फड़फड़ाया होगा
तब जाकर एक आशियाना बनाया होगा

सोच कर रूह कांपती है उस मंजिल को देखकर
न जाने कितने सपनों से इसे सजाया होगा
हम सब्र की इन्तहां नहीं रखते जनाब
उसने सब्र से ही परचम लहराया होगा

क़त्ल करके हम यूँ ही निकल जाते हैं मालिक
उसके लहू ने कितनों को रुलाया होगा
अपनी आजादी पर हम छिनते रहे उसकी आजादी
न जाने किस मुल्क में उसने घर बसाया होगा

हम करते रहे इन्तजार उसके ओठ खुलने का
लगता है माधव ने उसी समय शंख बजाया होगा
कितनी बार उसने पंख फड़फड़ाया होगा
तब जाकर एक आशियाना बनाया होगा ||
सर्वेश कुमार मिश्र 
2 अप्रेल 2016
समय-दोपहर 3:00 बजे
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय 
किशनगढ़, अजमेर |

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

गोरी आओ खेले रंग

गोरी आओ खेले रंग, लोग हो जाएँ देख के दंग
चढ़े भंग पे भंग, बाजे ढोल और मृदंग ||
प्यार के रंग का काढ़ा बना लें, भावनाओं की भंग चढा लें
दुश्मनी को जम कर भुला लें, आओ हृदय से हृदय मिला लें
अपने मन का कमल खिला लें, रोते हुए को आज हँसा लें
रंग अबीर का त्यौहार मना लें, सब को अपना परिवार बना लें
गोरी आओ खेले रंग, लोग हो जाएँ देख के दंग
चढ़े भंग पे भंग, बाजे ढोल और मृदंग ||
गोरे गालों को मसलकर, याद कर अपनी जवानी
बन पड़े इतिहास पलटकर, बना ले अपनी कहानी
रंग संग का खेल खेलकर, कर कोई ऐसी शैतानी
सारे मन का भेद भुलाकर, अपनी कर ले अमर निशानी
गोरी आओ खेले रंग, लोग हो जाएँ देख के दंग
चढ़े भंग पे भंग, बाजे ढोल और मृदंग ||
होरी छोरी से तुम खेलो, होरी छोरे से तुम खेलो
होरी शिवराज में खेलो, होरी रामराज है खेलो
पर रहे ध्यान यह सुन लो, अपनी मर्यादा ना भूलो
यह ध्यान रख के जिलो, तुम नजरों से ना गिरलो
गोरी आओ खेले रंग, लोग हो जाएँ देख के दंग
चढ़े भंग पे भंग, बाजे ढोल और मृदंग || 

होली पर विशेष 
सर्वेश कुमार मिश्र 
दिनांक- 09-03-16
समय- रात्रि- 2:10 
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

अब तो गाली बकना शेष रहा

आओ हम सब मिलकर गाली देते हैं, प्रधानमन्त्री को
आओ हम सब मिलकर गाली देते हैं, भारत माता को
क्यों ? क्यों ? करेंगे हम यह, क्यों ?
क्यों ? नहीं करेंगे हम, हम करेंगे, क्योंकि
हमें भी विश्वपटल पर छाना है
हमें भी कन्हैया के विपक्ष में खड़ा होना है
हमें भी राजनीति का हिस्सा होना है
क्योंकि, अब कुछ अच्छा करने को शेष नहीं
त्याग, तपस्या, बलिदानी होना अब शेष नहीं
अब तो गाली बकना शेष रहा, माँ का आँचल फाड़ना शेष रहा
अब देश नहीं विशेष रहा, हनुमत थापा का मरना न विशेष रहा
देशभक्त वीरों कि तस्वीरों पर, अब पुष्प चढ़ाना शेष रहा
देशभक्ति के गीतों को, चिल्ला कर गाना शेष रहा
अब तो गाली बकना शेष रहा, माँ का आँचल फाड़ना शेष रहा
अब देश नहीं विशेष रहा, हनुमत थापा का मरना न विशेष रहा    
राजनीति में आना है, तो हंगामा खड़ा करना होगा
देशद्रोह का स्वर्ण पदक ले, राजनीति में आना होगा
शिक्षा सदन हो या लोक सदन, गाली तो बकना होगा
देश के लिए अब क्या मरें, राजनीति पर मरना होगा
अब तो गाली बकना शेष रहा, माँ का आँचल फाड़ना शेष रहा
अब देश नहीं विशेष रहा, हनुमत थापा का मरना न विशेष रहा
विद्वेश कि राजनीति में, देश कि प्रगति थमी हुई है
दुश्मन की निगाहें भी,  देश के ऊपर गड़ी हुई है
देश कि नींव हिलाने में, विपक्ष की निगाहें धसी हुई है
भ्रष्टाचार कम क्यों हो रहा, विपक्ष में चिंता बनी हुई है 
अब तो गाली बकना शेष रहा, माँ का आँचल फाड़ना शेष रहा
अब देश नहीं विशेष रहा, हनुमत थापा का मरना न विशेष रहा
हम अपनी प्रगति को सोच रहे, हम देश कि प्रगति को सोच रहे
हम जनहित के बारे में सोच रहे, हम दाना-पानी को सोच रहे
पर वो सोच रहे दंगा कैसे हो, वो सोच रहे देश नंगा कैसे हो
वो सोच रहे जनसंख्या कम कैसे हो, वो सोच रहे अधर्म कैसे हो
आरक्षण की राजनीति कैसी हो, बेरोजगारी बढ़ाने की नीति कैसी हो
साम्प्रदायिक दंगे क्यों न हो, देश में भ्रष्टाचार कम क्यूँ हो
अब तो गाली बकना शेष रहा, माँ का आँचल फाड़ना शेष रहा
अब देश नहीं विशेष रहा, हनुमत थापा का मरना न विशेष रहा
आप को न्याय करना होगा, इस देश में अगर रहना होगा 
विजय का वरण करना होगा, हर बच्चे को फौजी बनना होगा
माँ की रक्षा करना होगा, प्यारे वन्देमातरम कहना होगा ||
अब तो गाली बकना शेष रहा, माँ का आँचल फाड़ना शेष रहा
अब देश नहीं विशेष रहा, हनुमत थापा का मरना न विशेष रहा ||



हनुमत थापा की याद में
 सर्वेश कुमार मिश्र 
दिनांक 07-मार्च-2016
महाशिवरात्रि, दिन सोमवार 
शाम 5:30 बजे