शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

‘दुखवा मैं कासे कहूँ सजनी’ का यथार्थ बना ‘रघुनाथ’






कुछ लिखूँ मैं अपनी कलम से इसके पहले मुझे महाप्राण निराला की ‘सरोज-स्मृति’ की वह पंक्ति याद आती है कि “ दुःख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही ।”1 काफी दशक बीत जाने के बाद भी वृद्धों के जीवन से दुःख कैसे चिपक जाता है उसकी एक बानगी हमें काशीनाथ जी के उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू’ में देखने को मिलता है । काशीनाथ जी जब यह घोषणा करते हैं कि “अगर ‘काशी का अस्सी’ मेरा नगर था तो ‘रेहन पर रग्घू’ मेरा घर है, सायद आपका भी ।” तो जाहिर है कि लोगों ने इसे काशीनाथ जी के घर की दास्तान समझ ली जो कि ऐसा दूर तक नहीं दिखाई पड़ता, हाँ जब हम इसे बड़े फलक पर देखते हैं तो यह ग्रामीण समाज व पुरानी मानसिकता से बंधी पीढ़ी में अवश्य परिलक्षित होती है । ‘रेहन पर रग्घू’ में कथानायक रघुनाथ की जो दशा चित्रित की गयी है या उनके परिवार के सदस्यों को जिस रूप में दिखाया गया है वह वर्तमान के सन्दर्भ में सत्य प्रतीत होता है । आज समाज इसी प्रकार की विसंगतियों का शिकार हो रहा है । गोपेश्वर सिंह ने ‘रेहन पर रग्घू’ के सन्दर्भ में कहा है कि “महात्मा गांधी ने कहा था कि मैं घर की खिड़कियाँ खोलकर रखना चाहता हूँ ताकि बाहर की हवा आए, लेकिन इतना नहीं कि तेज अंधड़ में मेरा घर और मेरे घर की चीजें उड़ने लगें । हमारे राष्ट्रीय और सामाजिक संबंधों में बाहरी लोगों के संपर्क से अनेक बदलाव आये । प्राचीन काल से अंग्रेजों तक अनेक जातियों के आक्रमण और संपर्क का गवाह रहा है हमारा समाज । उस संपर्क के कारण हमारे राष्ट्रीय-सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में अनेक तरह के बदलाव आये । वे बदलाव स्वाभाविक संपर्कों की परिणति थे । लेकिन पिछले दो दशकों में नयी आर्थिक नीति के आने के बाद जितनी तेजी से बदलाव की हवा चली है वह किसी आँधी से कम नहीं । हमने अपने घर की खिड़कियाँ दरवाजे खोल रखे हैं और तेज आंधी में हमारे घर की सारी चीजें उड़ने लगी है । रघुनाथ और उनका घर इस आँधी में तहस-नहस हो जाता है भूमंडलीय व्यवस्था में आदमी के अकेले पड़ते जाने की इतनी मार्मिक कथा रचना अभी हिंदी में नहीं लिखी गयी ।”2 आइये अब आगे बढ़ते हुए उपन्यास को संक्षेप में इस प्रकार देखते हैं – एक सौ चौसठ पृष्ठों का यह उपन्यास आकार में लघु पर रग्घू की विडंबना देखकर यह काफी व्यापक हो जाता है । पूरी कथा रघुनाथ और उनके परिवार के चारों तरफ घूमती है । परन्तु इस घूमने की प्रक्रिया का जो केंद्र है वह रघुनाथ ही है । पूरी कथा पहाड़पुर गाँव तक सीमित न होकर बनारस,नोएडा, रांची यहाँ तक कि अमेरिका भी पहुँच गयी है । यही भूमंडलीकरण की कथा बन गयी । आकर में छोटा पर पूरा महाकाव्य छिपाए हुए यह उपन्यास हिंदी उपन्यास की दुनियां में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । क्या कुछ नहीं बदला इधर के वर्षों में । तेजी से आये इस बदलाव ने हमारे परिवार और समाज के परंपरित ढाँचे को हिलाकर रख दिया । देखते-देखते हमारा पुराना ढाँचा टूट चूका है । नया जो बन रहा है वह इतना आत्मकेंद्रित,जड़विहीन और निर्मम है कि उसमें रघुनाथ जैसे लोगों के लिए जगह नहीं है । रघुनाथ निहत्थे और अकेले हैं । उनका परिवार कहने को तो है पर बाहरी रूप से, अन्दर कोई जुड़ाव नहीं । बड़ा बेटा कॉलेज मैनेजर की बेटी से शादी नहीं करता, इसलिए वे कॉलेज से निकाल दिए जाते हैं । बेटा अमेरिका चला जाता है । वहाँ वह और बेहतर कैरियर की तलाश में दूसरी औरत से जुड़ता है और अपनी पत्नी को छोड़ देता है । उसकी पत्नी विवश हो बनारस लौटती है । दूसरा बेटा प्रतियोगिताओं के नाम पर आँख में धूल झोंकता है और अंततः नोएडा में एक कारपोरेट हाउस में काम करने वाली एक बच्चे की माँ के साथ ‘लिविंग टुगेदर’ का जीवन जीने लगता है । बेटी पढ़ लिखकर नौकरी करती है, पर रघुनाथ जहाँ चाहते हैं वहाँ शादी नहीं करती । वह जिस दलित युवक से शादी करना चाहती है, उससे रघुनाथ संस्कारवश नहीं स्वीकार करते । वह शहर में अकेले रहती है और दलित युवक के साथ सहजीवन स्वीकार कर लेती है । गाँव में रघुनाथ अपमानित होते हैं । आदरणीय समझे जाने वाले रघुनाथ का साथ कोई नहीं देता । गाँव में नया घर बनाने बेटा-बेटी की शादी धूम धाम से करने, और पोता-पोती को देखने की रघुनाथ की साध धरी रह जाती है, गाँव जब रहने लायक नहीं रह जाता, तब वे बनारस बड़े बेटे की परित्यक्ता पत्नी के पास जाते हैं । पहाड़पुर और बनारस यानि गाँव और शहर तक फैली इस कथा के नायक रघुनाथ की अजीब और विवश दास्तान को पढ़ते हुए मुझे स्वीकार करने में थोड़ी हिचक होती है पर जब आज मैं अपने गाँव और नित सुबह अखबार में दो चार खबरों से रूबरू होता हूँ तो कुछ भी भ्रम नहीं रह जाता । आज वास्तव में सारे सम्बन्ध इतनी तेजी से बदल रहें हैं । भूमंडलीकृत व्यवस्था के तहत बदलाव तो आया है लेकिन इतनी तेजी से आया है, यह उपन्यास पढ़कर महसूस हुआ । इस बदलाव के कारण हमारी दुनिया कितनी निर्मम, आत्मकेंद्रित, जड़ विहीन और सन्वेदनशील हो गयी है । इसकी दिलचस्प और प्रामाणिक कथा है –‘रेहन पर रग्घू’ ।
          सदाशिव श्रोत्रिय का मानना है कि “आर्थिक समृद्धि के साथ ही चिकित्सा भोजन और जीवन पद्धति में सुधार ने जहाँ एक ओर मध्यवर्गीय लोगों की जीवन प्रत्याशा में वृद्धि की है वहीं दूसरी ओर सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों के परिवर्तन ने उनकी वृद्धावस्था के लिए कई नई समस्याएं उत्पन्न की हैं । आज के तेजी से बदलते हालात में वृद्धों की स्थिति में आ रहे इन परिवर्तनों को संवेदना पूर्ण ढंग से चित्रित करने का काम काशीनाथ सिंह ने ‘रेहन पर रग्घू’ में किया है ।”3 आज की नई पीढ़ी जो कृतघ्न एहसानफरामोश है वह कैरियर बनाने के चक्कर में प्यार-व्यार का सौदा करने में नहीं हिचकती । वस्तुतःबढ़ते हुए व्यक्तिवादी सोच ने आज हमारे पारंपरिक वैवाहिक ढाँचे को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है । पिछले 15-20 वर्षों में वैवाहिक संस्था सबसे अधिक दरकी है । खास कर उस समाज में जहाँ शिक्षा ने धन कमाने का तिकड़म दिया है । स्त्री चेतना और बाजार के प्रभाव ने पुरानी व्यवस्था को लगभग ध्वस्त कर दिया है । रघुनाथ की बेटी सरला दहेज के चक्कर में पिता को परेशान होता देखती है तो अंतरजातीय प्रेम विवाह के पक्ष में पिता के सामने अपना तर्क पेश करती है – “आप दूसरों की शर्तों पर शादी कर रहे थे, यहाँ मैं करुँगी लेकिन अपनी शर्तों पर, आप मेरी ‘स्वाधीनता’ दुसरे के हाथ बेंच रहे थे, हाँ मैं भविष्य देख रही हूँ, जहाँ स्पेस ही स्पेस है ।”4 सरला जहाँ अपने भविष्य में ‘स्पेस’ ही ‘स्पेस’ देख रही है वही रघुनाथ के भविष्य में अन्धकार भरता जा रहा है सुदेश भारतीय का नाम सुनते ही रघुनाथ खटिया पर पसर गए और दोनों हाथ उठाकर बोले — “हे भगवान ! यह क्या कर रहे हो मेरे साथ ! लाला तक गनीमत थी लेकिन अब ? मैं क्या करूँ ? किसे मुख दिखाऊं ? वे पागल की तरह अनाप सनाप बक-झक करने लगे ।”5 पहाड़पुर गाँव में कथानायक रघुनाथ एकमात्र पढ़े-लिखे आदमी थे जो संघर्ष करते हुए एक कॉलेज की अध्यापकी तक पहुंचे थे । पहले साइकिल से और बाद में स्कूटर से कॉलेज आने-जाने लगे । वह उसी मध्यवर्ग के प्रतिनिधि हैं जो नित नए सपने देखता है । उन्होंने दबे कुचले दलितों की शक्ति को भाँप लिया था इसलिए चमटोल के हलवाहे जब हड़ताल की धमकी दे रहे थे तभी रघुनाथ ने ठाकुरों को समझाया था कि मजदूरी बढ़ाने की उनकी मांग जायज है । यह उनका हक है । उन्होंने सुझाव भी दिया था—“या तो उनकी मांगों पर सहानभूति के साथ विचार करें या फिर एक ट्रैक्टर खरीदें ! और चूंकि हममें से कोई एक इस हैसियत में नहीं है कि अकेले खरीद सकें  इसलिए हल पीछे दाम बाँध दें । सब लोग मिलकर खरीदें ।”6 यह समस्या का उचित समाधान हो सकता था लेकिन ठाकुरों के सामने यह समस्या उठ खड़ी हुई कि इसे चलाएगा कौन ? हैल्पर और खलासी भी तो चाहिए । रघुनाथ ने इसका समाधान भी ढूँढ़ निकला—यहाँ पर रघुनाथ जी बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हुए कहते हैं “अपने ये लड़के जो पिछले सात-आठ साल से कंपटीशन के नाम से गाँव से नगर और नगर से गाँव मोटर साइकिल पर मटरगस्ती कर रहे हैं ! जब नौकरी का कोई ठिकाना नहीं तो यही करें ।”7 यह सुनते ही उनके चहरे तमतमा उठे ! आँखें लाल हो गयी । वे बुजुर्गों के सामने कसमसाकर रह गए । सबसे मानिंद बुजुर्ग बब्बन कक्का को भी यह सुझाव रास नहीं आया । क्या विडम्बना है कि जाति वर्ण विभाजित सामंती समाज व्यवस्था में शारीरिक श्रम को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है । हल की मूठ पकड़ना तो सवर्ण समाज के लिए  अपमानजनक था ही, अब ट्रैक्टर चलाने में भी वे अपनी हेठी देख रहे थे जिसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा ।
काशीनाथ सिंह ने पिछड़ों और दलितों में स्वाभिमान का नया प्रकाश तथा रघुनाथ को साथ रखते हुए सामाजिक आर्थिक पतन को भी दर्शाया है । रघुनाथ अपनी जमीन पिछड़ी जाति के स्नेही को बटाई पर इसलिए देते हैं कि वह मेहनती और ईमानदार है । इसकी प्रतिक्रिया ठाकुरों में होती है । जग्गन जब रघुनाथ से इस सन्दर्भ में कुछ कहता है तो रघुनाथ उनको टका सा जबाब देते हैं वे कहते हैं –“देखो जग्गन, फालतू हैं ये बातें । समय बहुत बदल गया है । आज मानसिक रूप से विकलांग ही ऐसी बातें करते हैं । किस बात के बड़े हैं हम तुम ? पुरखों की जमीन और जाति के भरोसे ? छब्बू की हत्या के बाद भी यह भ्रम तो पाले ही रहो । पिछले दिनों तुमने ही अपने खेत बेचे, ठाकुरों में से किसी ने क्यों नहीं खरीदा ?...।”8  यहाँ रघुनाथ का जो भी उपदेश है वो परिवर्तन की झलक तो जरूर देता है पर घर में आने पर सब उपदेश धरे के धरे रह जाते हैं । पारिवारिक विघटन में छोटे बेटे धनंजय की भूमिका भी कम कष्टदायक नहीं थी । जो डोनेशन देकर सीधे मैनेजर बनने का ख्वाब देख रहा था । जब प्रो सक्सेना ने धनंजय के हाथ समधी रघुनाथ के लिए पांच लाख रुपये भिजवाये तो धनंजय ने उसमें से चालीस हजार मोटर साइकिल के लिए रख लिए और बाकी रुपए भी बाद में डोनेशन के नाम पर लड़-झगड़ हड़प लिए । किसी को पता नहीं की उसका एडमिशन हुआ या नहीं ! सोनल के बुलाने पर एक बार अशोक विहार आया भी तो ठहरा एक होटल में किसी लड़की के साथ जिसकी एक बेटी भी थी । पूछने पर पता चला कि दोनों के बीच वैवाहिक संबंध जैसा कोई रिश्ता नहीं है बल्कि दोनों को एक दूसरे की जरूरत है इसलिए  एक साथ रहते हैं । उसके आने की खबर पाकर रघुनाथ जान-बूझकर पहले ही पहाड़पुर चले गए थे कि देखें बाप से मिलने पहाड़पुर आता है या नहीं । धनंजय पहाड़पुर नहीं गया तो नहीं गया ! अत: अपने को तबाह कर दोनों बेटों में अपना उज्ज्वल भविष्य देखने वाले रघुनाथ पूरी तरह टूट चुके थे । बिना रिश्ते के सहजीवन की पश्चिमी प्रवृत्ति अब भरतीय समाज में भी आ रही थी ।
घर का मुखिया कितने अरमान संजोता है अपने जेहन में कि हमारा एक संस्कारयुक्त परिवार हो, बच्चे अच्छी से अच्छी जगह नौकरी करें, घर में संतोष से दो जून की रोटी मिलती रहे, घर के आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूंजती रहे, बहुओं के पायल में पड़ी घुन्घुरुओं की आवाजों से घर का वातावरण संगीतमय बना रहे । अगर मुखिया एक गिलास पानी मांगे तो उसके सामने लोटा भर पानी रख दिया जाय । यही तो सोचते थे हमारे बुजुर्ग, पर आज के समय को देखते हुए जो उपभोक्तावादी नई संस्कृति पैदा हुई है उसने तो पूरी सोच को ही बदलकर रख दिया है । हर नया आदमी पैसे और अपनी सुख-सुविधा के पीछे इस प्रकार दौड़ लगा रहा है कि वह यह भूल गया है कि वह पृथ्वी पर आया कैसे ? किसके सपनों ने उसे इस काबिल बनाया ? आज के पिता-पुत्र जब आपस में कोई विवाद करते हैं और इस पर जब पिता यह कहता है कि मैनें तुमको पैदा किया है तो इस पर पुत्र का जबाब होता है कि आपने हमें पैदा नहीं किया बल्कि आप मजे ले रहे थे और हम गलती से आ गए इसलिए एहसान जताना छोड़िये । आज देश में वृद्धों की संख्या के साथ-साथ वृद्धाश्रमों की संख्या भी तेज गति से बढ़ रही है । वृद्धाश्रमों में जाकर जब आप यह जानते हैं कि यहाँ पर जो वृद्ध लोग हैं इनके बच्चे गरीब नहीं हैं बल्कि कोई आईएस है तो कोई खरबपति है परन्तु इन बुजुर्गों के लिए उनके पास कोई जगह नहीं । आज की शिक्षा को देखते हुए ऐसा लगता है कि जो शिक्षित नहीं हैं उनके पास भरा-पूरा परिवार है और बुजुर्ग लोग वहाँ पर आनंद से जीवनयापन कर रहे हैं । आज समाज में अगर कोई संयुक्त परिवार है तो जो दो कदम आगे निकलकर अच्छी डिग्रियाँ ले लिए हैं वो इस परिवार को पिछड़ा बताते हैं और कहते हैं कि ऐसे लोग कभी आगे नहीं बढ़ सकते । आज रघुनाथ की भी यही स्थिति है तीनों बच्चों को पढ़ा लिखाकर पैरों पर खड़े होने के काबिल बनाया तो ऐसे खड़े हुए की पिता के आगे कभी कहीं झुके नहीं और रघुनाथ ऐसे झुके की  फिर कभी उठे नहीं । उनके बच्चों द्वारा ऐसा शूल मिला जिसे न किसी को दिखा सकते थे न अन्दर घुसा सकते थे ।
और अंत में चौथीराम यादव के शब्दों में “सामंतवादी और पूंजीवादी संस्कृतियों की टकराहट में किसान संस्कृति पिस रही है । प्रेमचंद के किसान आज लाखों की संख्या में आत्महत्याएं कर रहे हैं । आधुनिकीकरण के चलते गाँवों में होने वाले बदलाव को लेखक ने पहाड़ पुर के माध्यम से देखने का प्रयास किया है । रेहन पर रग्घू इन्हीं दो संस्कृतियों के द्वंद्वात्मक संघर्ष और किसान संस्कृति के उजड़ने का महा आख्यान है और रघुनाथ इसके महानायक ।”9      
सन्दर्भ-
1.      शर्मा रामविलास, ‘राग विराग’, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, लोक भारती प्रकाशन, महात्मा गांधी मार्ग इलाहाबाद, प्र.सं.2010,पृष्ट 91
2.      ‘चौपाल’ संपादक, कामेश्वर प्रसाद सिंह, अंक :1,वर्ष 1, पृष्ट 58
3.      ‘चौपाल’ संपादक, कामेश्वर प्रसाद सिंह, अंक :1,वर्ष 1, पृष्ट 73 
4.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 54
5.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 52 
6.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 62 
7.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 62 
8.      सिंह काशीनाथ, ‘रेहन पर रग्घू’ राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली,प्र.सं.तीसरी आवृत्ति 2014,पृष्ट 98 
‘चौपाल’ संपादक, कामेश्वर प्रसाद सिंह, अंक :1,वर्ष 1, पृष्ट 31
शोध विषय पर शोध-पत्र 
सर्वेश कुमार मिश्र
शोधार्थी, हिंदी विभाग
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय
बांदरसिंदरी, अजमेर।
मो. 9559636736
                                                                                                  Email-curajskmishra@gmail.com  

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