हमारे विश्वविद्यालय
का पूरा वातावरण प्राकृतिक है । शाम का वातावरण और भवानी जी की थड़ी का तो क्या
कहना । भिन्न-भिन्न प्रान्तों से आये बच्चे जब थड़ी पर इकठ्ठे होते हैं तो हमें
अपने इलाहाबाद के संगम की याद आ जाती है, ऐसा लगता है मानो संगम के कूलों पर चलने
वाली वह पवन तमाम व्यवधानों को पार कर इस परिसर में अपनी शीतल हवा रूपी बहन को पा
इतना झूम उठी है कि पूरा वातावरण उनके आनंद रूपी क्षीरसागर में स्नान करने लगा हो ।
यह सत्य है कि अगर विश्वविद्यालय में कहीं आनंद का क्षण है तो वह है शाम को ‘भवानी जी की थड़ी’ । और उस थड़ी की मिठास और भी बढ़
जाती है जब भवानी जी ये कहें कि “वो कोई बात नहीं सर आओ पहले चाय तो पियो ।” वैसे
मैं 2009 से चाय नहीं पीता ये हमारे करीबी जानते हैं फिर भी भवानी जी का वह सहृदय
व्यवहार हमें खींच कर ले जाता है और भवानी जी के द्वारा “वो मिश्रा जी क्या हाल
है” और हमारे द्वारा यह कहना कि “और बताइये भवानी जी सब ठीक तो है ।” फिर भवानी जी
द्वारा यह कहना “वो हमें क्या हुआ सब तो आपकी दुआ है” हम दोनों गदगद हो जाते हैं ।
मेरी
एक बुरी आदत बनती जा रही है मैं किताबों से ज्यादा लोगों को पढ़ने लगा हूँ , गाँवों
का भ्रमण करना, वहाँ का जीवन देखना जैसे शगल बनता जा रहा है । प्रकृति को निहारना
तो बचपन की आदत है । एक दिन टहलते-टहलते मैं पास के एक गाँव में पहुँच गया । हमारे
यहाँ (ईशापुर,जौनपुर, उ.प्र.) के गाँवों से अलग पर ममता, प्यार, सम्मान एक जैसा ।
हाँ यहाँ का अतिथि सत्कार तो मानो हमारे गाँव को ठेंगा दिखा रहा हो ।
अभी मैं शैतान सिंह
के घर बैठा ही था और आपस में बातचीत हो ही रही थी कि अचानक से एक गाँव के बुजुर्ग
आये और शैतान के सामने हाथ जोड़कर रोने लगे । शैतान जी ने उनको चुप कराया और चारपाई
पर बैठा कर ठंडा पानी पिलाया । पानी पीते समय भी वो हिचकी लेते रहे, आँख से आँसू झरते
रहे । शैतान को वो अपने साथ अपने घर ले जाना चाह रहे थे तो मैंने ही पहल कि और हम
सब बाबा जी के साथ चल दिए । बाबा जी के घर पहुँचने पर तो वहाँ का दृश्य बड़ा ही
कारुणिक था ; सभी तरफ से चीखने-चिलाने की आवाज आ रही थी छोटे-छोटे बच्चे भी रो रहे
थे । जब मैंने दरवाजे पर खड़े एक व्यक्ति से पूंछा तो उसने बताया कि “रामपियारी आज
सुबह मर गयी जो कि इस परिवार की एक मात्र सहारा थी । बच्चे उसको बहुत प्यार करते
थे और वह भी बच्चों को पाकर भावविभोर हो जाया करती थी । उसकी अभी कोई ज्यादा उम्र
भी तो नहीं थी, यही दो महीने पहले ही उसने पहले बच्चे को जन्म दिया था । वो देखिए,
वहाँ पर वह छोटा सा बच्चा अपनी माँ के लिए कैसे रो रहा है ? उसको घर के अन्य बच्चे
कैसे चारों तरफ से घेरकर खड़े हैं ।” यही कहकर वो भी रोने लगे । मैं उनके कन्धे पर
हाथ रखा और धीरे से आगे बढ़ गया । दूसरी तरफ चारपाई पर एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठे मिल
गए तो मैं उनके पास जाकर उनको प्रणाम किया और पास में ही बैठ गया । उन्होंने सर
उठाकर मेरी तरफ आँखें दबाये ऐसे देखा कि एकबार तो मैं डर सा गया । कुछ देर बाद
धीरे से उन्होंने पूंछा कि “आप तो हमारे गाँव से नहीं हो, न ही राजस्थान के हो, आप
कहाँ से आए हो ।” मैंने बड़े उत्साह से कहा – “बाबा हम तो आपके बगल में जो
विश्वविद्यालय है वही से आए हैं ।” इतका सुनना था कि 80 वर्ष की उम्र का वह वृद्ध,
अचानक युवा जोश से भर गया और तनकर खड़ा हो गया । अपने बेटे को आवाज लगा कर कहा पकड़ो
इसे यही है रामपियारी का कातिल । इसने ही मारा है उसे । पूरे विश्वविद्यालय ने
मारा है उसे । यही कह कर वो अचानक चारपाई पर गिर पड़ते हैं और सुन्न पड़ जाते हैं ।
मैं डर के मारे थर-थर कांपने लगा कि इतने में उनका बड़ा लड़का दीनानाथ आया और मुझे
एक तरफ ले गया । मैं जब थोड़ा सा संभल सका तो मैंने दीनानाथ से पूंछा कि आखिर बाबा
ने ऐसा क्यों कहा हमें, हमने तो कुछ नहीं कहा, न किया फिर ऐसा क्यों ? दीनानाथ ने
हमारे कन्धे पर हाथ रखकर और रुंधे गले से पूरी बात बताई । उसने बताया कि- “रामपियारी
के जाने से पूरे परिवार पर मानों पहाड़ टूट पड़ा हो । वो हमारे परिवार का आधार थी,
हमारे छोटे-छोटे बच्चों का जीवन थी । अभी दो माह पहले उसने बच्चे को जन्म दिया था ।
हमारे छोटे बच्चे आस-पास के बच्चों के साथ मिलकर खूब थाली बजाई थी, खूब नाचे थे ; पर
देखो आज कैसे सुध-बुध खो कर उस बच्चे से चिपके हुए हैं जो आज अनाथ हो गया है ।
हमारी रामपियारी को तीन दिन पहले कुछ नहीं हुआ था । वह एकदम स्वस्थ थी पर अचानक दो
दिन पहले उसकी तबियत खराब हो गयी और उसने धीरे-धीरे खाना छोड़ दिया । हमने सारे
उपाय किये अंत में डॉक्टर को दिखाया तो डॉ साहब ने हमसे पूंछा कि इसे आपने 2-3
महीने से क्या खिलाया है । मैंने सच-सच बता दिया कि कई महीने से विश्वविद्यालय से
बचा जूठा भोजन अपनी रामपियारी को खिलाया है । डॉ साहब ने कहा कि आपने रामपियारी को
जो खिलाया है उसमें से अगर कुछ बचा हो तो हमें दिखाओ । हमने उन्हें जूठे से भरी
हुई बाल्टी उनके पास रख दी । डॉ साहब ने पैर मारकर बाल्टी गिरा दी और पूरा जूठा घर
के बाहर फैला दिया फिर पता नहीं क्या आधे घंटे से कभी लकड़ी से तो कभी अपनी अंगुली
से कुछ खोजने लगे । अचानक उनको एक छोटा सा टुकड़ा मिल गया और उसे पानी से धोकर
दिखाया उस पर सिर्फ ‘स’ लिखा हुआ था ; जिससे यह समझने में डॉ साहब को देर नहीं लगी
और उन्होंने तुरंत कहा कि यह सरस दूध के पाउच का टुकड़ा है जिसे आपकी गाय कई महीने
से खा रही है वैसे तो किसी जानवर के मुख में जल्दी कोई अखाद्य पदार्थ नहीं जाता
फिर भी जब हम उनको जान बूझ कर खिलाएंगे तो वो तो गलती से खा ही लेगी । ऐसे ही
टुकड़े ने उसके लीवर, किडनी को ख़त्म कर दिया और उसकी मौत हो गयी । इतना सुनकर वही
पास में बैठे सरपंच जी आ गए और सभी को संबोधित कर कहने लगे कि इस गौ हत्या का पाप
विश्वविद्यालय के मुखिया को पहले लगेगा क्योंकि उनकी लापरवाही से, उनके लचीले
कानून से और विश्वविद्यालय को बारीकी से निरीक्षण न करने का परिणाम है- रामपियारी
का मरना । उसके बाद वहाँ के विद्यार्थियों का नम्बर आता है जो अपने आप पर घमण्ड
करते हैं कि मैं तो इतने ऊँचे कुल खानदान से हूँ और इतनी बड़ी संस्था में अध्ययन
करता हूँ । मैं वैज्ञानिक बनूँगा, डॉक्टर बनूँगा, इंजीनियरिंग की पढ़ाई करूँगा तो
इंजीनियर बनूँगा । अरे ! मैं तो कहता हूँ कि इन अबोध बच्चों का आहार छीन कर
रामपियारी को मार कर कोई भी कुछ नहीं बन सकता । अगर वह इंसान न बन सका और इन
बेचारे निरीह जानवरों के बारे में तनिक सोच भी न सका तो ऐसे विद्यार्थियों को ऐसी
संस्था के मालिक को या यह भी कह सकते हैं कि ऐसे संस्थान को अपने देश में रहने का
कोई अधिकार नहीं और ये भाई (मेरी तरफ मुख करके) तुम भी इसके दोषी हो क्योंकि तुम
भी उसी संस्थान से हो । क्या तुमको पता है कि इस समय रामपियारी की कीमत कितनी थी ?
अरे ! पूरे 55 हजार दाम मिल रहा था पर इन निरीह बच्चों के कारण रामपियारी को नहीं
बेचा गया । अच्छा मैं आपके आगे हाथ जोड़ता हूँ आपसे हमें कोई सफाई नहीं चाहिए दुखती
रगों पर हाथ मत फेरिए आप बस यहाँ से चले जाइए ।
मैं सर नीचे किए हुए और रुधे गले से धीरे-धीरे
वहाँ से अपने विश्वविद्यालय चला आया और आज भी मेरे सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा है कि
आखिर में रामपियारी की हत्या का दोषी कौन है ?


लेखक-सर्वेश कुमार मिश्र,
ग्राम व पोष्ट- ईशापुर, जिला- जौनपुर उ. प्र.
Mob- 9559636736
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें